तारा संस्थान वृद्धाश्रम : विश ट्री और पारिवारिक अनुबंध, बुजुर्गों की इच्छाओं का अर्थशास्त्र और नई पीढ़ी की सामाजिक पूंजी

उदयपुर। भारत अक्सर अपनी युवा आबादी और ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की डींगें हांकता नहीं थकता। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की दौड़, स्टार्टअप्स का विस्तार और वर्कफोर्स की औसत उम्र जैसे आंकड़ों को देखकर लगता है कि देश केवल युवाओं के दम पर दौड़ रहा है। मगर इस आर्थिक संक्रमण और शहरीकरण का एक कड़वा आर्थिक सच यह भी है कि पारंपरिक ‘इंटर-जनरेशनल कॉन्ट्रैक्ट’ (अंतर-पीढ़ीगत सामाजिक अनुबंध) तेज़ी से बिखर रहा है। कभी माता-पिता बच्चों पर निवेश करते थे और बुढ़ापे में वही बच्चे उनके लिए एक किस्म की अनौपचारिक पेंशन और सोशल सिक्योरिटी का काम करते थे। आज आर्थिक गतिशीलता, एकल परिवारों की बाध्यता और महानगरों की भागदौड़ ने बुजुर्गों को वृद्धाश्रमों की चारदीवारी तक सीमित कर दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में उदयपुर के तारा संस्थान द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में मिरांडा पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा आयोजित ‘विश ट्री’ पहल को केवल एक भावुक आयोजन मान लेना अधूरी समझ होगी; यह दरअसल सामाजिक पूंजी (Social Capital) के उस घाटे को पाटने की एक माइक्रो-कोशिश है, जो हमारे बाज़ार-आधारित विकास ने पैदा किया है।

मांग और आपूर्ति का मानवीय संतुलन: ‘विश ट्री’ का मॉडल

अर्थशास्त्र में अक्सर मांग और आपूर्ति के वित्तीय संतुलन की बात की जाती है, लेकिन वृद्धाश्रमों में सबसे बड़ी कमी पूंजी की नहीं, बल्कि भावनात्मक उपस्थिति और संवाद की होती है।

स्कूल के बच्चों ने आश्रम के बुजुर्गों को पर्चियां देकर उनकी अधूरी इच्छाएं लिखवाईं और उन्हें एक ‘विश ट्री’ पर टांगकर पूरा करने का संकल्प लिया। यह विश ट्री प्रतीकात्मक रूप से यह बताता है कि आधुनिक जीवनशैली में बुजुर्गों की बुनियादी जरूरतें—रोटी, कपड़ा और बुनियादी छत—तो संस्थागत रूप से पूरी की जा सकती हैं, मगर आत्मसम्मान, अपनेपन और किसी से अपनी छोटी-सी ख्वाहिश साझा करने की ज़रूरत बाज़ार के किसी सुपरमार्केट में नहीं बिकती।

विद्यार्थियों का बुजुर्गों के साथ फिल्मी तरानों पर थिरकना, हंसी-मज़ाक साझा करना और तस्वीरें संजोना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि दो भिन्न पीढ़ियों के बीच ‘इमोशनल डेफिसिट’ को शून्य करने का एक प्रभावी उपक्रम है।

सहानुभूति का निवेश: क्या यह दीर्घकालिक समाधान है?

नई पीढ़ी में संवेदनशीलता और सेवा भाव जगाने का यह प्रयोग निश्चित रूप से सराहनीय है। कॉर्पोरेट जगत में जिसे सीएसआर (Corporate Social Responsibility) कहा जाता है, स्कूलों के स्तर पर यह ‘विद्यार्थी सामाजिक उत्तरदायित्व’ जैसा है। जब बच्चे किताबों से बाहर निकलकर समाज के अंतिम छोर पर बैठे इन वरिष्ठ नागरिकों की तन्हाई से रूबरू होते हैं, तो वे केवल बेहतर नागरिक नहीं बनते, बल्कि भविष्य के उस कार्यबल के रूप में तैयार होते हैं जो मानवीय मूल्यों को नफे-नुकसान से ऊपर रखना सीखता है।

मगर एक अर्थशास्त्री के तौर पर हमें सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना होगा। भारत की साठ पार आबादी अगले ढाई दशकों में बढ़कर कुल जनसंख्या का लगभग बीस फीसदी होने वाली है। क्या चंद स्कूलों की सद्भावना यात्राएं और ‘विश ट्री’ उस विशालकाय ‘सिल्वर सुनामी’ को संभाल पाएंगे?

कटु सत्य यह है कि भावनात्मक मुलाक़ातें घावों पर मरहम तो लगा सकती हैं, लेकिन वे उस नीतिगत नाकामी का विकल्प नहीं हो सकतीं जिसके तहत हमारे पास एक पुख्ता राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन, व्यापक जेरियाट्रिक हेल्थकेयर और गरिमापूर्ण ओल्ड-एज इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। जब तक राज्य और समाज मिलकर बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा को एक कानूनी व वित्तीय अधिकार नहीं बनाएंगे, तब तक वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती रहेगी।

फिर भी, जब तक व्यवस्था पूरी तरह संभलती नहीं, तब तक मिरांडा पब्लिक स्कूल के इन बच्चों जैसी पहल यह याद दिलाती है कि आर्थिक रूप से रिटायर हो चुके बुजुर्ग समाज के लिए ‘लायबिलिटी’ नहीं, बल्कि वह अनमोल धरोहर हैं जिन्हें बाज़ार के अंधे दौर में भुलाया नहीं जा सकता। यह ‘विश ट्री’ केवल इच्छाओं का पेड़ नहीं, बल्कि उस टूटे हुए मानवीय अनुबंध को फिर से जोड़ने की एक खूबसूरत और ईमानदार कोशिश है।

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