संभल हिंसा मामला : सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की रासुका (NSA) के तहत हिरासत को किया रद्द, यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भी पलटा; पुलिस हिरासत के कथित कबूलनामा आधारित निवारक हिरासत को सुप्रीम कोर्ट ने बताया गैरकानूनी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज को बड़ी राहत देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई उसकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया है, जिसमें उसकी हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था। कोर्ट ने इस कार्रवाई को गैरकानूनी मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश पारित नहीं कर सकती थी। फैसला सुनाते समय न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अपने दिवंगत कानून सहायक की स्मृति को यह फैसला समर्पित किया।

क्या है पूरा मामला?

मुल्ला अफरोज पर वर्ष 2024 में संभल में शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर किए गए सर्वे के बाद भड़की हिंसा में शामिल होने का आरोप है। इस हिंसा के दौरान चार लोगों की मौत हो गई थी।

घटना के करीब 54 दिन बाद अफरोज को गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे पर आधारित थी।

बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उसे जमानत मिल गई थी, लेकिन इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ एनएसए (NSA) के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी कर दिया गया।

हाईकोर्ट द्वारा इस आदेश को सही ठहराए जाने के बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

कबूलनामे की प्रमाणिकता पर सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस हिरासत में लिए गए कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता पर कड़ा सवाल उठाया और कहा कि ऐसा कबूलनामा निवारक हिरासत के लिए आवश्यक ‘व्यक्तिपरक संतुष्टि’ का आधार नहीं बन सकता।

आपराधिक मामलों का होना ही पर्याप्त नहीं: अदालत में दलील दी गई कि केवल कई आपराधिक मामलों का मौजूद होना अपने आप में निवारक हिरासत का आधार नहीं हो सकता, इसके लिए पर्याप्त सामग्री के आधार पर वास्तविक संतुष्टि आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा था कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका थी कि अफरोज दोबारा हिंसा कर सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों को खारिज करते हुए हिरासत आदेश को रद्द कर दिया और सरकार पर जुर्माना लगाया।

स्रोत : लाइव लॉ हिंदी

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