उदयपुर। त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों की असली प्रासंगिकता कर्मकांडों के दिखावे में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वे समाज को भीतर से कितना संवेदनशील और मानवीय बनाते हैं। जब धर्म की व्याख्या महज मोक्ष की कामना तक सीमित न रहकर समाज के सबसे उपेक्षित तबके की गरिमा से जुड़ जाए, तो वह वास्तविक अर्थों में लोक-कल्याणकारी बन जाता है। शारदीय नवरात्र के मौके पर उदयपुर के सेवातीर्थ स्थित ‘वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी’ परिसर में चल रही श्रीमद् देवी भागवत कथा के मंच से नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने ठीक इसी वैचारिक विमर्श को स्वर दिया।
कथा के दौरान उन्होंने माँ कालरात्रि और माँ सरस्वती के प्रतीकों को आधार बनाकर केवल पौराणिक आख्यानों का पाठ नहीं किया, बल्कि उन्हें वर्तमान सामाजिक संदर्भों, मानवीय व्यवहार और खासकर दिव्यांगजनों की स्थिति से जोड़ते हुए विचारोत्तेजक दृष्टिकोण सामने रखा।
अहंकार, त्याग और अंतःकरण का द्वंद्व
कथा प्रसंगों के सूक्ष्म विश्लेषण में अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि पौराणिक कथाएं दरअसल मानवीय वृत्तियों का आईना हैं:
सत्ता और ज्ञान का मद: देवराज इंद्र और देवगुरु बृहस्पति के प्रसंग के हवाले से उन्होंने रेखांकित किया कि जब समाज या व्यक्ति में अहंकार घर कर जाता है, तब वह वरिष्ठों, शिक्षकों और नैतिक मूल्यों का तिरस्कार करने लगता है—और इसका अंतिम परिणाम सामूहिक संकट के रूप में सामने आता है।
बलिदान की परंपरा: महर्षि दधीचि की अस्थियों के दान का स्मरण कराते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज का समाज परोपकार और लोकहित के लिए अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठने को तैयार है?
आचरण की स्वतंत्रता: वहीं, वृत्रासुर के आख्यान के जरिए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल या विषम क्यों न हों, सही और गलत के चुनाव का दायित्व सदैव मनुष्य के अपने विवेक और आचरण पर ही निर्भर करता है।
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद: बौद्धिक संपदा और भौतिकता की सीमाएं
ज्ञान की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती के प्रसंग में उन्होंने महर्षि याज्ञवल्क्य की ज्ञान साधना का उल्लेख किया। गुरु की आज्ञा पर ज्ञान त्याग देने के बाद पुनः कठोर तप से उसे अर्जित करने की घटना यह सिद्ध करती है कि सत्य और विद्या किसी की बपौती नहीं, बल्कि सतत साधना का फल हैं।
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