कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़, 17 की मौत : जहां गूंजने थे शंख और ढाक के बोल, वहां बिखर गईं सिसकियां और मातम

 

कोलकाता। शारदीय नवरात्र की पावन बेला, जब पूरा बंगाल माँ जगदम्बा के आगमन के उल्लास में डूबा था, ढाक की गूँज और शंखनाद से दिशाएँ पावन हो रही थीं—तभी नियति ने आस्था के सबसे बड़े आँगन में एक ऐसा क्रूर खेल खेला कि हर आँख छलक पड़ी। उत्तरी कोलकाता के गिरीश पार्क स्थित ऐतिहासिक ‘चोरबागान’ दुर्गा पंडाल में, जहाँ पिछले 91 वर्षों से श्रद्धालु माँ के ममतामयी रूप के दर्शन कर जीवन धन्य मानते आए थे, शनिवार की शाम अचानक महा-उत्सव चीख-पुकार और आंसुओं के समंदर में तब्दील हो गया।

हाथों में पूजा की थाली, नयनों में माँ के दर्शन की अभिलाषा और होठों पर ‘जय माँ दुर्गा’ का जयकारा लेकर पहुँचे 17 मासूम श्रद्धालुओं की साँसें वहीं पंडाल की चौखट पर हमेशा के लिए थम गईं। काल के इस निर्मम प्रहार का शिकार बनने वालों में 13 माताएं-बहनें, 3 पुरुष और एक वह नन्हा मासूम बच्चा भी शामिल है, जिसने शायद अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था।

आस्था और कुदरत का द्वंद्व: बारिश से बचने की होड़ बनी काल
शनिवार शाम करीब 7:40 बजे का वह मनहूस पल जब आसमान से अचानक मेघ बरसने लगे। बारिश की बूंदों से अपने बच्चों और परिजनों को बचाने के लिए लोग पंडाल के भीतर सिमटने लगे, तो वहीं बाहर खड़े सैकड़ों श्रद्धालु भी माँ की छत्रछाया में शरण पाने को आतुर हो उठे।

चोरबागान के उस 360-डिग्री ऊँचे घुमावदार गलियारे में, जहाँ से गुजरते हुए भक्त माँ के दिव्य विग्रह को निहारने की आस लगाए थे, अचानक बेकाबू भीड़ का सैलाब उमड़ पड़ा। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि भारी दबाव के बीच जब लकड़ी के ढाँचे ने दम तोड़ा, तो मानो जिंदगी और मौत के बीच का फासला मिट गया। देखते ही देखते वह पवित्र प्रांगण, जो माँ के जयकारों से गूँज रहा था, अपनों को पुकारती चीखों और बिखरी हुई चप्पलों-पूजा सामग्रियों से पट गया।

सिसकते परिजन, बुझ गए कई घरों के चिराग
कोलकाता मेडिकल कॉलेज का मंजर किसी का भी कलेजा चीर देने वाला है। जहाँ एक तरफ अस्पताल के गलियारों में 40 से अधिक जिंदगी और मौत से जूझते घायलों की कराहें गूँज रही हैं, वहीं मोर्चरी के बाहर अपनों को तलाशती आँखों का विलाप पत्थर दिल को भी पिघला दे। कोई अपनी माँ को ढूँढ रहा था, तो कोई उस अभागे बच्चे के बेजान शरीर से लिपटकर बिलख रहा था, जो कुछ देर पहले माँ की उंगली पकड़कर ‘दुर्गा माई’ को देखने निकला था।

घटना के बाद पूरे इलाके की बत्तियाँ बुझा दी गईं, पंडाल के कपाट बंद कर दिए गए—मगर जो सूनापन उन 17 परिवारों के घरों में पसरा है, उसकी भरपाई शायद कोई शब्द, कोई ढांढस नहीं कर सकता।

माँ के चरणों में आंसुओं का तर्पण
प्रशासन, पुलिस और हुक्मरान अपनी जाँच, मुआवजे और जिम्मेदारियों के गणित में उलझे हैं; पूजा समिति के आयोजकों से सवाल-जवाब हो रहे हैं और हेल्पलाइन नंबर जारी कर औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर मौजूदा नेतृत्व तक संवेदनाएं प्रकट कर रहा है।

मगर झकझोर देने वाला सबसे बड़ा सवाल तो उस आस्था के सामने खड़ा है—जहाँ भक्त अपने सारे दुख-दर्द भूलकर रक्षा की आस में माँ के दरबार पहुँचे थे, वहीं से उनकी अर्थियाँ उठीं। आज पूरा कोलकाता स्तब्ध है, ढाक की थाप खामोश है और हर श्रद्धालु नम आँखों से बस यही पूछ रहा है कि हे माँ, अपनी संतानों के इस इम्तिहान में यह कैसी महा-विपदा आन पड़ी?

 

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