फोटो एंड रिपोर्ट कमल कुमावत, उदयपुर
सिनेमा और थियेटर का सबसे बड़ा जादू यह है कि वह जब अपनी संपूर्णता में घटता है, तो अभिनेता का मुखौटा उतर जाता है और दर्शक का अहंकार गल जाता है। शनिवार की रात झीलों की नगरी उदयपुर के निम्बार्क महाविद्यालय प्रांगण में कुछ ऐसा ही तिलस्म रचा गया। मंचन तो श्रीराम लीला का था, लेकिन जो घटा वह केवल संवादों की अदायगी नहीं, बल्कि सदियों पुराने मानवीय दर्द की पुनरावृत्ति थी।
जब युद्धभूमि में मेघनाद का अमोध शक्तिबाण लक्ष्मण की छाती को चीरता हुआ निकला और वे अचेत होकर गिरे, तो मंच पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का वह धीरोदात्त रूप नहीं, बल्कि एक असहाय बड़े भाई की विवशता खड़ी थी। ईश्वर जब रोता है, तो समूची सृष्टि का कलेजा कांप उठता है। राम के उस हाहाकार और विलाप ने दर्शक दीर्घा में बैठे हर व्यक्ति की पलकों को नम कर दिया। यह अभिनय की वह पराकाष्ठा थी जहाँ वृंदावन के पुष्टिमार्गीय श्रीकृष्ण लीला संस्थान के कलाकारों ने मंच पर त्रेतायुग को साकार कर दिया। फिर जब सुषेण वैद्य के परामर्श पर पवनपुत्र हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आए और लक्ष्मण की मूर्च्छा टूटी, तब तुलसीदास की चौपाई का वह सुकून सभागार की हर सांस में तैर गया। इससे पूर्व लंका के राजदरबार में रावण के अहंकार को चुनौती देता अंगद का अडिग पैर, श्रीराम सेना का प्रस्थान, विभीषण शरणागति और सेतुबंध रामेश्वरम के दृश्यों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखा।
कला महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. नीरज शर्मा ने इस रस-संस्कृति को दार्शनिक आधार देते हुए ठीक ही कहा—’रामो विग्रहवान धर्मः’। राम केवल धर्म के रक्षक नहीं, वे स्वयं धर्म का साक्षात स्वरूप हैं और ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ को जीने का सबसे सहज माध्यम यह रंगकर्म ही है।
एक सुंदर परंपरा का निर्वाह करते हुए शनिवार सुबह वृंदावन की इस 40 सदस्यीय मंडली ने समिति अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी व अन्य सदस्यों के साथ श्रीनाथजी की हवेली में राजभोग की झांकी के दर्शन किए। हवेली के भंडारी रामचंद्र सनाढ्य, समाजसेवी कन्नू भाई पारीक और राजेश भाई मेहता ने कलाकारों को उपरणा ओढ़ाकर रंगमंच की इस साधना का सम्मान किया।
इस महाआयोजन के नेपथ्य में एक विराट बिरादरी की आत्मीयता काम कर रही थी। समिति महासचिव भंवरलाल शर्मा के अनुसार, मंच पर कला और समाज के समन्वय का सम्मान हुआ। अतिथियों में नाथद्वारा मंदिर मंडल के अधिकारी सुधाकर शास्त्री, उद्योगपति धीरेंद्र सच्चान, सुनील भाई जैन, प्रो. नीरज शर्मा, रेडक्रॉस सोसायटी के सचिव गजेंद्र भंसाली, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिनेश श्रीमाली, दीपक सुखाड़िया, वात्सल्य सेवा समिति के अध्यक्ष प्रकाश अग्रवाल, उदयपुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र जैन, पूर्व अध्यक्ष जयकृष्ण दवे, लोकतंत्र सेनानी श्यामसुंदर लोहार, जिला क्रिकेट संघ के यशवंत पालीवाल, पार्षद निर्मला पालीवाल, समाजसेवी डॉ. भंवर हीरावत, भगवती लाल सोनी, वैद्य पुष्करलाल शर्मा, एम. एल. गोयल, परसराम पालीवाल (इंदौर), जिला सांख्यिकी अधिकारी पुनीत शर्मा और भंडारी रामचंद्र सनाढ्य उपस्थित रहे।
इन विभूतियों का सत्कार अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी, संयोजक डॉ. विजय विप्लवी, समन्वयक अशोक बाबेल, हरीश मारवाड़ा, प्रवक्ता कौशल मूंदड़ा, चेतन माली, राकेश पालीवाल, चैनशंकर दशोरा, धरणीधर तिवारी, जगन्नाथ शर्मा, निर्मल चौबीसा, दीपक डांगी, एडवोकेट दिनेश गुप्ता, गोपाल कनेरिया, जगदीश मेनारिया, प्रभाष सुखवाल और रोहित चौबीसा जैसे निष्ठावान रंगकर्मियों व कार्यकर्ताओं ने किया।
इस सांस्कृतिक अनुष्ठान के सामाजिक सरोकार भी कम दिलचस्प नहीं रहे। 20 अक्टूबर को सेक्टर-14 में होने वाले रावण दहन के लिए भूमि पूजन का दायित्व वाल्मीकि समाज की प्रतिनिधि बहनों—श्रीमती शांता बाई व श्रीमती तुलसीबाई को सौंपा गया, जहाँ नगजीराम मीणा ने श्रीफल बधारकर और गैंती चलाकर सामाजिक समरसता की नई इबारत लिखी। वहीं ‘वृक्षम अमृतम सेवा संस्थान’ के अध्यक्ष डॉ. गोपेश शर्मा, कमला शर्मा, अनिल पारिख, यशवंत त्रिवेदी और मनोज आंचलिया ने 201 तुलसी के पौधों का वितरण कर मंच को प्रकृति व पर्यावरण से जोड़ दिया।
संयोजक डॉ. विजय प्रकाश विप्लवी ने संकेत दिया है कि नौ रातों के इस आंतरिक मंथन के बाद रविवार को कुंभकरण, मेघनाद और लंकापति रावण के दर्प का अंत होगा, जिसके बाद श्रीराम के राज्याभिषेक का वह भव्य दरबार सजेगा जो हर मनुष्य के भीतर एक नया दीपोत्सव रच जाएगा। पर्दा अभी गिरा नहीं है, क्लाइमेक्स का इंतज़ार बाकी है।
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