ग्वालियर-ट्रक ने 45 श्रद्धालुओं को कुचला, 13 मौतें : जहां जलनी थीं मन्नतों की ज्योत, वहां बिछ गईं 13 श्रद्धालुओं की लाशें

ग्वालियर। नवरात्र की पावन बेला में जब पूरी कायनात माँ की भक्ति के रंग में डूबी थी, हाथों में चुनरी और नारियल लिए श्रद्धालु जगतजननी शीतला माता के दर पर शीश नवाने पहुंचे थे—उन्हें क्या खबर थी कि काल का एक अंधा पहिया उनकी ज़िंदगी की डोर सदा के लिए काटने आ रहा है। शनिवार और रविवार की दरमियानी रात करीब डेढ़ बजे ग्वालियर के चीनौर रोड स्थित शीतला माता मंदिर प्रांगण में जो मंजर उभरा, उसने इंसानियत का सीना चीर कर रख दिया। एक बेकाबू, तेज रफ्तार ट्रक ने माँ के दर्शन की आस में खड़े करीब 45 श्रद्धालुओं को बेरहमी से रौंद डाला। पल भर में मंदिर का पावन प्रांगण श्मशान में बदल गया और 13 बेगुनाह ज़िंदगियां मौके पर ही दम तोड़ गईं।

मरने वालों में ममतामयी माताएं थीं, अपने कंधों पर परिवार का बोझ उठाए बुजुर्ग थे और वे मासूम फूल जैसे बच्चे थे, जिनकी खिलखिलाहट अभी ठीक से दुनिया ने सुनी भी नहीं थी। इसके साथ ही दो पुलिसकर्मियों सहित 29 लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, जिनमें से 7 की हालत बेहद नाजुक है।

चीख-पुकार, धूल का गुबार और मलबे में दबी मन्नतें
रात का सन्नाटा माता के जयकारों और प्रसाद की दुकानों की रोशनी से गुलजार था। तभी चीनौर रोड की ढलान से मौत बनकर उतरे एक अनियंत्रित ट्रक ने सब कुछ लील लिया। सड़क किनारे सजी दुकानों को रौंदता हुआ यह दानवरूपी ट्रक सीधे मंदिर के मुख्य द्वार और पक्की दीवार से जा टकराया। टक्कर इतनी प्रलयंकारी थी कि दीवार भरभराकर ढह गई और 40 से 50 श्रद्धालु पत्थरों और ईंटों के मलबे के नीचे दब गए।

हादसे के प्रत्यक्षदर्शी गजेंद्र प्रजापति का कराहता हुआ बयान रोंगटे खड़े कर देता है—”समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ। बस एक तेज धमाका हुआ और चारों तरफ धूल, धुएं और अपनों को पुकारती चीखों के सिवा कुछ बाकी न था।” किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला; मन्नतों के जो धागे अभी बंधे भी नहीं थे, वे लहूलुहान होकर टूट गए।

अस्पताल में बिखरा आंसुओं का सैलाब: ‘देवरानी का बेटा नहीं मिला…’
ग्वालियर के एक हजार बिस्तर अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर की फिजां इस वक्त परिजनों के करुण क्रंदन से दहल उठी है। अस्पताल अधीक्षक डॉ. सुधीर सक्सेना ने जब 13 मौतों की पुष्टि की, तो अस्पताल के गलियारों में सन्नाटे को चीरती हुई चीखें गूंज उठीं।

एक बेबस मां सावित्री का विलाप पत्थर दिल को भी रुला दे। फफकते हुए वह बस यही कहे जा रही थी—”हम सब तो दर्शन कर बाहर निकल आए थे, लेकिन मेरी देवरानी का कलेजे का टुकड़ा, नन्हा दिव्यांश कहीं नहीं दिखा। पुलिस से गुहार लगाई, हर कोने में ढूंढा… फिर जब अंदर जाकर सफेद कफन हटाया, तो सामने मेरे लाल का बेजान शरीर पड़ा था।” एक पल पहले जो बच्चा माँ की उंगली थामे प्रसाद मांग रहा था, वह अगले ही पल बेजान देह बनकर सामने आया।

बुझ गए 8 घरों के चिराग, कईयों की शिनाख्त बाकी
प्रशासन ने अब तक जिन 8 अभागों की पहचान की है, उनकी उम्र देखकर आंखें भर आती हैं:

15 वर्ष का मासूम शौर्य शर्मा और 16 वर्ष का प्रिंस उर्फ छोटू जाटव, जिनकी पूरी जिंदगी अभी सामने थी

17-18 साल के युवा देवेश बघेल, विमलेश और गौरव परिहार, जो अपने माता-पिता का सहारा बनने का सपना देख रहे थे

22 साल का सत्येंद्र गुर्जर

गृहस्थी की धुरी 45 वर्षीय महेश शर्मा और 50 वर्षीया सरला तोमर

बाकी शवों की शिनाख्त के लिए परिजन मोर्चरी के बाहर रोते-बिलखते भटक रहे हैं।

आस्था का यह कैसा इम्तिहान?
पुलिस ने ट्रक को जब्त कर लिया है, प्रशासनिक अमला जांच और कागजी कार्यवाहियों में जुट गया है—लेकिन उन परिवारों के आंसुओं का क्या, जिनकी खुशियां एक झटके में उजड़ गईं? नवरात्र के जिस पावन पर्व पर माँ के आशीष से झोलियां भरनी थीं, वहाँ से एक साथ 13 अर्थियां उठ रही हैं। आज ग्वालियर का हर बाशिंदा स्तब्ध है, हर नयन भीगा है और हर जुबां पर बस एक ही सवाल है कि हे माँ शीतला, अपनी संतानों के विश्वास का यह कैसा क्रूर इम्तिहान था?

 

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