
मुंबई। मुंबई की आबोहवा में बारूद की बू कोई नई नहीं है, लेकिन 90 के दशक के उस ख़ूनी अंडरवर्ल्ड को क़ानून के शिकंजे में कसने का जो दावा दशकों तक किया गया, आज वह खोखला साबित होता दिख रहा है। शनिवार शाम विले पार्ले पश्चिम और जुहू की सड़कों पर अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर चली गोलियों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि देश की आर्थिक राजधानी और सिनेमा की सबसे चमकती नगरी अब अपराधियों के लिए महफ़ूज़ खेल का मैदान बन चुकी है।
वेस्ट ज़ोन-2 के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) मोहित गर्ग ने घटना की पुष्टि करते हुए यह ज़रूर कहा कि टाइगर श्रॉफ सुरक्षित हैं और उन्हें गोली नहीं लगी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मशहूर चेहरे का ‘बाल-बाल बच जाना’ इस शहर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए राहत का सबब हो सकता है? जुहू जैसा पॉश इलाक़ा, जहां कदम-कदम पर पुलिस की निगरानी और सीसीटीवी का जाल होने का दावा किया जाता है, वहां दिनदहाड़े या शाम ढलते एक बड़े अभिनेता की गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियाँ चल जाना किसी आम वारदात की तरह नहीं देखा जा सकता।
वारदातों का एक अंतहीन सिलसिला : जब डर रोज़मर्रा की बात बन जाए
यदि आप पिछले कुछ महीनों और वर्षों के घटनाक्रम को एक कड़ी में पिरोकर देखें, तो यह साफ़ हो जाता है कि मुंबई अब महज़ ‘फ़िल्मी गपशप’ का केंद्र नहीं, बल्कि गिरोहों की खुली धमकियों का बंधक बन चुकी है:
बाबा सिद्दीकी जैसे कद्दावर राजनीतिक चेहरे की सरेराह हत्या हो जाती है।
सलमान ख़ान के बांद्रा स्थित आवास ‘गैलेक्सी अपार्टमेंट्स’ पर खुलेआम गोलियाँ बरसाई जाती हैं।
आए दिन अभिनेताओं, निर्देशकों और निर्माताओं को रंगदारी और जान से मारने की धमकियाँ मिलती हैं।
और अब जुहू में टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को निशाना बनाया जाता है।
यह केवल कुछ मशहूर नामों पर हुआ हमला नहीं है; यह उस आम मुंबईकर के आत्मसम्मान और भरोसे पर हमला है, जो कभी इस शहर की सुरक्षित रातों पर गर्व किया करता था। जब वीआईपी सुरक्षा से घिरे सितारे अपनी ही गाड़ियों में सुरक्षित नहीं हैं, तो उपनगरीय लोकल ट्रेनों और संकरी गलियों में चलने वाले आम नागरिक के जीवन की क्या क़ीमत रह जाती है?
सियासी वार-पलटवार : ‘अराजकता का पर्याय बनती सरकार’
इस ताज़ा गोलीबारी के बाद राजनीतिक गलियारों में मचे घमासान का होना लाज़मी था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन सावंत ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर मौजूदा प्रशासनिक तंत्र को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए तीखा सवाल दागा है—’मुंबई में आख़िर चल क्या रहा है?’
सावंत का यह कहना कि ‘मुंबई में क़ानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और यहां क़ानून का राज नहीं बल्कि अराजकता हावी है’, केवल एक विपक्षी दल का राजनीतिक बयान भर नहीं है, बल्कि उस ज़मीनी हक़ीक़त की गूँज है जिसे मंत्रालय के कमरों में बैठे हुक्मरान अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह तंज़ कि ‘पहले कहा जाता था कि महाराष्ट्र बिहार बन गया है, लेकिन अब कहने का समय आ गया है कि बिहार बेहतर है’—महाराष्ट्र की प्रशासनिक साख पर एक करारा तमाचा है।
सवालों के घेरे में खाकी और निज़ाम
डीसीपी मोहित गर्ग का यह कहना कि ‘मामले की जांच जारी है’, एक रटा-रटाया प्रशासनिक जुमला लगता है। जाँच तो सलमान ख़ान के घर पर हुई फ़ायरिंग की भी चल रही है, जांच तो अन्य धमकियों की भी हो रही है, लेकिन ज़मीनी नतीजा क्या है?
सच्चाई यह है कि जब तक पुलिस और गृह विभाग संगठित गिरोहों के आर्थिक स्रोतों, सोशल मीडिया के ज़रिए फैलाई जा रही दहशत और स्थानीय स्तर पर उन्हें मिल रहे राजनीतिक या लॉजिस्टिक संरक्षण की जड़ पर प्रहार नहीं करेंगे, तब तक मुंबई की सड़कों पर ऐसे ‘टार्गेट’ बदलते रहेंगे। आज टाइगर श्रॉफ बचे हैं, कल कोई और होगा।
मायानगरी को विज्ञापनों और निवेश के नारों से चमकाने से पहले सरकार को यह समझना होगा कि जिस शहर की सड़कों पर खौफ़ का साया हो, वहाँ न तो निवेश टिकता है और न ही गरिमा। मुंबई को खोखले बयानों की नहीं, एक सख़्त और पारदर्शी इक़बाल की ज़रूरत है—जो अपराधियों की रूह कंपा सके, न कि जनता को दहशत में जीने पर मजबूर करे।
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