फोटो एंड रिपोर्ट : कमल कुमावत, उदयपुर
जीवन के किसी भी बड़े नाटक की अंतिम सार्थकता इसमें नहीं है कि पर्दा कब गिरा, बल्कि इसमें है कि जब रोशनी बुझी तो वह अपने पीछे कौन सा विचार, कौन सी चेतना छोड़ गई। रविवार की रात झीलों के शहर उदयपुर में सूरजपोल स्थित निम्बार्क महाविद्यालय के रामलीला प्रांगण में जो घटा, वह केवल एक दस दिवसीय पारंपरिक मंचन का अवसान नहीं था; वह अधर्म के निशांत पर धर्म के उस सूर्योदय की घोषणा थी, जो सदियों से मानवीय मन के अंधेरों को छांटता आया है।
श्रीराम लीला समिति के तत्वावधान में 9 अक्टूबर से प्रवाहित हो रही भक्ति, मर्यादा और सनातन चेतना की पावन धारा ने रविवार को अपने पूर्णत्व को छुआ। मंच पर युद्ध कांड के निर्णायक क्षण थे—एक ओर अहंकार का अंतिम अट्टहास था, तो दूसरी ओर मर्यादा का अडिग संकल्प। विशालकाय कुंभकरण और मायावी मेघनाद के पराभव के बाद जब राम और रावण का महासंग्राम सजीव हुआ, तो समूचा प्रांगण मंत्रमुग्ध था। जैसे ही प्रभु श्रीराम के अमोध बाण ने दशानन की नाभि स्थित अमृत कुंड को सुखाया, दस सिरों वाला वह अहंकारी प्रतीक भरभराकर गिर पड़ा। मानस की वह अमर चौपाई—‘जस जस प्रभु सायक सर संधा। तस तस दसानन सिर कटि बंधा॥ कटे सीस पुनि भए नवीन। प्रभु लीला नहिं जान प्रबीन॥’—रंगमंच पर जीवंत हो उठी और पूरा पांडाल धर्म-विजय के उद्घोष से दहल उठा।
लेकिन इस कथा की सबसे सुंदर और दार्शनिक परत ठीक इसके बाद खुली। मृत्यु शैया पर पड़े महाज्ञानी, प्रकांड पंडित और कूटनीति के धुरंधर रावण से जब राम ने लक्ष्मण को ज्ञान लेने भेजा, तो रंगकर्म ने जीवन का सबसे गहरा पाठ पढ़ा दिया। सिरहाने खड़े अनुज को राम का यह समझाना कि विद्या या ज्ञान कभी अहंकार से नहीं, चरणों में झुककर ही पाया जाता है—दर्शक दीर्घा के अंतर्मन को छू गया।
लक्ष्मण जब शीश झुकाकर रावण के चरणों के पास खड़े हुए, तब अपनी अंतिम सांसें गिनते लंकापति ने राजनीति और आचार-विचार की तीन त्रिकालदर्शी सीखें दीं:
शुभस्य शीघ्रम: शुभ और कल्याणकारी कार्य में कभी देर न करो, और अनैतिक व अशुभ विचार को जितना हो सके टालते रहो।
शत्रु को कभी हीन न समझो: अपने सारथी, द्वारपाल, भाई या साधारण दिखने वाले वानर-भालुओं को कभी कमजोर समझने की भूल मत करना; रावण का यही दंभ उसके सर्वनाश का कारण बना।
रहस्य का चक्र: जीवन के मर्म और गुप्त भेद कभी किसी ऐसे के सामने उजागर मत करो जो कालान्तर में विभीषण सिद्ध हो जाए। प्रचंड पांडित्य के बावजूद मर्यादाहीन होने पर मनुष्य का क्या हश्र होता है, रावण के इन अंतिम वचनों ने समूचे परिसर को निस्तब्ध और विचारमग्न कर दिया।
इसके बाद मंचन ने उस स्वर्णिम स्वप्न की ओर करवट ली, जिसका इंतजार हर युग की आंखें करती हैं। माता सीता की अग्निपरीक्षा और पुष्पक विमान से प्रभु श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण और हनुमान का अवध आगमन आनंद-सिंधु का ऐसा सैलाब लाया कि उदयपुर का प्रांगण साक्षात साकेत धाम में तब्दील हो गया। गुरु वशिष्ठ द्वारा जैसे ही प्रभु का राज्याभिषेक हुआ, फूलों की मूसलाधार वर्षा के बीच शंख, घड़ियाल और महाआरती की दिव्य ज्योतियों के साथ उत्तरकांड की अमर चौपाई गूंजी—‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥’
इस दार्शनिक संदर्भ को समेटते हुए समिति अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी ने सटीक कहा कि राम का चरित्र केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन जीने की आचार संहिता है। यह दस दिनों का अनुष्ठान जनमानस में सत्य और मर्यादा की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प रहा। वहीं विशिष्ट अतिथि झाड़ोल माकड़ादेव आश्रम के महंत गुलाबदास महाराज ने सनातन दर्शन की गहराई समझाते हुए कहा कि रामायण, गीता, वेद और उपनिषद केवल प्रदर्शन के लिए नहीं, अपितु जीवन दर्शन के लिए हैं। हमारा सनातन दर्शन किसी की जान लेने का नहीं, बल्कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के संकल्प का वाहक है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए सभी को बचाने का साहस दिखाने वाले स्मित मत्छार के प्रसंग का उल्लेख करते हुए माताओं-बहनों से बच्चों को हनुमान चालीसा कंठस्थ कराने का आह्वान किया।
रंगकर्म और सामाजिक ताने-बाने का यह संगम अतिथियों के सत्कार में भी झलका। समिति महासचिव भंवरलाल शर्मा के अनुसार, मंच पर संत गुलाबदास महाराज (माकड़ादेव), पूर्व नगर नियोजक बी.एस. कानावत, राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल, कांग्रेस के शहर जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़, रक्तदान क्षेत्र के रिकॉर्डधारी रवीन्द्रपाल सिंह कप्पू, औदीच्य समाज के अध्यक्ष मोहन औदीच्य, पार्षद महेशपुरी गोस्वामी, पूर्व पार्षद घनश्याम चावला, जगदीश मेनारिया, सिद्धार्थ शर्मा, बोहरा गणेश मंदिर के पुजारी गोपीलाल जोशी, शिशु भारती संस्थान के निदेशक जितेश श्रीमाली, समाजसेवी नारायण मेघवाल, श्यामसुंदर मोड़, रामचंद्र जोशी (नाथद्वारा), जगदीश जोशी, नंदकिशोर जोशी (इंदौर) और सहस्त्र औदीच्य समाज उदयपुर की अध्यक्ष इन्द्रा शर्मा का आत्मीय अभिनंदन किया गया।
इन सभी अतिथियों का सम्मान अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी, डॉ. विजय विप्लवी, समन्वयक अशोक बाबेल, हरीश मारवाड़ा, प्रवक्ता कौशल मूंदड़ा, कमल कुमावत, चेतन माली, राकेश पालीवाल, चैनशंकर दशोरा, धरणीधर तिवारी, जगन्नाथ शर्मा, निर्मल चौबीसा, दीपक डांगी, एडवोकेट दिनेश गुप्ता और गोपाल कनेरिया ने किया।
संयोजक डॉ. विजय प्रकाश विप्लवी ने जानकारी दी कि मंचन की इस पावन पूर्णाहुति के बाद अब 20 अक्टूबर को विजयदशमी के पावन पर्व पर सेक्टर-14 में भव्य रावण दहन का कार्यक्रम आयोजित होगा, जहां सायंकाल पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार अपनी विविध रंगारंग प्रस्तुतियां देंगे। नाटक समाप्त हुआ है, मगर मर्यादा की जो लौ इस मंच से उठी है, वह हर अंतःकरण में जलती रहनी चाहिए।
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