
आर्थिक तंगी की आग में जली तीन मासूम जिंदगियां, दिलीप ने पत्नी और बच्चों को सुला दिया… फिर खुद भी सदा के लिए सो गया
उदयपुर। शहर की फिजाओं में हरियाली अमावस्या के मेले का शोर था, लेकिन शुक्रवार को एक ऐसा मातमी सन्नाटा घुल गया, जिसने सिर्फ चार दीवारों के भीतर बसे एक छोटे से परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनाओं को झकझोर दिया। हिरण मगरी थाना क्षेत्र के प्रभात नगर में एक ऐसा हृदयविदारक दृश्य सामने आया, जहां एक टूटे हुए इंसान की बेबसी ने उसकी दुनिया छीन ली। दिलीप चितारा नाम का वह व्यक्ति… जो शायद काफी समय से अंदर ही अंदर घुट रहा था… जिसने मुस्कराते हुए जीने की कोशिश की, लेकिन जब उम्मीदें चुक गईं, तो अपने सबसे प्रिय लोगों को भी इस दुख से मुक्ति देने की ठान ली।
शुक्रवार दोपहर जब दरवाजा तोड़ा गया, तो भीतर का मंजर ऐसा था कि किसी की भी रूह कांप जाए। कमरे में दिलीप फंदे से झूल रहा था, और उसके सामने बिस्तर पर उसकी पत्नी अलका और दो मासूम बेटे—मनवीर और खुशबीर—निर्जीव पड़े थे। अलका के गले पर तार के निशान थे, और दोनों बच्चों के मुँह पर एक दर्दनाक खामोशी… जिनकी आँखों ने शायद आखिरी बार अपने पिता को देखा होगा, उस विश्वास के साथ कि वह उन्हें बचाएगा, पर वह तो उन्हें इस दुनिया से बचा रहा था।
दिलीप का जीवन बीते कुछ महीनों से एक सिसकता हुआ संघर्ष था। चाचा माणक चितारा बताते हैं कि कुछ महीने पहले भतीजे ने कर्ज का जिक्र किया था। सलाह दी गई थी कि मकान बेचकर कर्ज चुका दे, लेकिन दिलीप शायद खुद को पहले ही बेच चुका था—अपने हालात, अपनी चिंता, अपनी असहायता के हाथों। किसी से कुछ कह नहीं पाया। कुछ दिन पहले दुकान पर मिला भी था, हंसा, बातें कीं… जैसे कुछ हुआ ही न हो। कौन जानता था, उसकी मुस्कान में इतना दर्द छिपा है।
यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं है। यह उस व्यवस्था का आइना है, जहां आर्थिक तंगी सिर्फ जेब नहीं काटती, आत्मा को भी घायल कर देती है। जहां मदद की गुहार कहने से पहले लोग डरते हैं—नाकामी का, समाज का, या अपनी ही कमजोरियों का।
मनवीर… दस साल का बच्चा, जिसकी उम्र अबोध सवालों से भरी होनी चाहिए थी। खुशबीर… तीन साल की नन्हीं सी जान, जिसे दुनिया ने अभी ठीक से छुआ भी नहीं था। और अलका… एक मां, जिसने घर को संभाला, शायद पति का दर्द भी समझा, लेकिन अंत में सब कुछ नियति के उस क्रूर फैसले के आगे थम गया।
आज प्रभात नगर में चूल्हा नहीं जला, किसी घर में बच्चों की किलकारी नहीं गूंजी। आज वहां सिर्फ एक सवाल गूंजता रहा—क्या हम वाकई किसी के दुख को समय पर पहचानते हैं?
यह खबर पढ़ना आसान है, भूल जाना भी शायद आसान हो, लेकिन एक दिल जो हर रात डर के साये में जीता रहा, एक मां जिसकी ममता कफ़न में लिपट गई, और दो मासूम जिंदगियां जिनकी खिलखिलाहट कभी किसी गलियों में गूंजती थी—उन्हें भूल पाना नामुमकिन है।
अब सिर्फ तसल्लियां बची हैं… और वो प्रश्न, जो रह-रह कर चुभते हैं—क्या ये मौतें रोकी जा सकती थीं? क्या एक वक़्त पर हाथ बढ़ा देने से ये मासूम जिंदा रह सकते थे?
इस त्रासदी को बस एक खबर समझ कर मत पढ़िए… इसे एक पुकार समझिए, उन तमाम दिलों की जो अभी टूटे नहीं हैं, लेकिन दरक रहे हैं—चुपचाप, भीतर ही भीतर।
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