नया पार्षद और वो मनहूस ग्रुप

चुनाव से पहले उस ग्रुप का नाम था—‘वार्ड की तरक्की—भाई साहब के संग’।
तब उस ग्रुप की आबोहवा में बड़ा खुलूस था। सुबह-सुबह कोई उगते सूरज के साथ हाथ जोड़े भगवान की तस्वीर भेजता, तो कोई पीले गुलाब पर चमकती ओस की बूंदों के साथ ‘सुप्रभात’ लिख देता। और फिर ठीक नौ बजे, भाई साहब—यानी हमारे होने वाले पार्षद जी—का हाथ जोड़े, बत्तीसी चमकाता हुआ एक नया पोस्टर नमूदार होता। नीचे मोटे हर्फों में लिखा होता : “आपकी खिदमत, मेरा ईमान!” लोग ताली बजाने वाले पीले इमोटिकॉन की बौछार कर देते। भाई साहब को लगता कि सारा मोहल्ला उनकी जेब में आ चुका है।

फिर वोट पड़े। बक्से खुले। भाई साहब जीत गए। मालाएं ऐसी लादी गईं कि गर्दन दुखने लगी, और गुलाल ऐसा उड़ा कि तीन दिन तक आंखें लाल रहीं।

लेकिन चौथे दिन, जब खुमारी उतरी, तो मोबाइल की घंटी ने नींद हराम कर दी।

किसी कमबख्त ने ग्रुप का नाम बदलकर रख दिया—‘समस्या निवारण’।

बस, वहीं से तमाशा शुरू हुआ। वह ग्रुप, जो कभी वफादारी का हलफनामा था, अब एक खुला कसाईखाना बन चुका था।

सुबह छह बजे, जब पार्षद जी आंखें मलते हुए चाय का पहला घूंट भरने की सोच ही रहे होते, स्क्रीन पर ‘टुंग’ की आवाज होती। नीचे शर्मा जी ने एक तस्वीर चस्पां की होती—कुत्ते ने नाली से कचरा खींचकर सड़क के बीचों-बीच फैला दिया था। साथ में छोटा सा जुमला लिखा होता: “भाई साहब, ये देखिए आपका ईमान!”

पार्षद जी ने अभी सफाई दरोगा को फोन मिलाया भी नहीं होता कि वर्मा जी की वीडियो आ जाती—नल से मटमैला पानी टपक रहा था। फिर खान साहब का आडियो मैसेज—”अरे भाई, वो खंभे की ट्यूबलाइट जल गई या सिर्फ वोट के दिन ही उजाला था?”

पार्षद जी अपना माथा पकड़ लेते।

अरे भई, हथेली पर भी कहीं सरसों उगती है? यह हिंदुस्तान की म्युनिसिपैलिटी का सरकारी निज़ाम है, कोई अलादीन का चिराग तो नहीं कि घिसा और जिन्न हाजिर! एक फाइल बाबू की मेज से उठकर बड़े बाबू की मेज तक जाने में सात सिगरेटें और दो चाय पी जाती है। टेंडर निकलने में हफ्तों बीतते हैं और इंजीनियर साहब के दस्तखत के लिए उनकी मिजाजपुर्सी करनी पड़ती है।

कल ही तो बड़ी मशक्कत के बाद, एक अफसर के हाथ-पांव जोड़कर, एक गली का कचरा उठवाया था। पार्षद जी ने सोचा था कि आज सुकून से दो निवाले हलक के नीचे उतरेंगे। लेकिन जैसे ही उन्होंने ग्रुप खोला, वहां शाबाशी का एक लफ्ज न था। उलटे दस नई शिकायतें कतार बांधे खड़ी थीं:
— नाली का पानी उबलकर चौखट तक आ रहा है।
— सड़क का गड्ढा कब भरा जाएगा?
— आवारा मवेशी घर में घुस रहे हैं!

पार्षद जी ने सिगरेट सुलगाई और गहरा कश खींचकर धुआं छत की तरफ उछाल दिया।

सियासत की तवायफ भी अजीब है। जब तक वह वोट की मांग करती है, तब तक चौखट पर गिड़गिड़ाती है, और जब गले में जीत का तौक पड़ जाता है, तो वही चौखट फांसी का फंदा बन जाती है।

उन्होंने मोबाइल को घूरा। स्क्रीन पर फिर एक लाल बत्ती चमकी—एक नई तस्वीर, एक नई नाली, और एक नया ताना।

पार्षद जी बुदबुदाए, “हरामखोरों ने वोट क्या दे दिया, जैसे मुझे कौड़ियों के भाव खरीद लिया हो…”

मगर फिर उन्होंने अपनी अचकन का कॉलर ठीक किया, एक बनावटी मुस्कुराहट चेहरे पर चिपकाई और ग्रुप में टाइप किया:
“प्रिय वार्डवासियों, आपकी हर समस्या मेरी अपनी है। काम प्रगति पर है।”

सच्चाई बस इतनी थी कि काम कहीं नहीं चल रहा था, सिर्फ मोबाइल की बैटरी खत्म हो रही थी।

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