सियासत के परदे के पीछे : जब तलवार से नहीं, डर की फुसफुसाहट से कट गया टिकट

उदयपुर। राजनीति के इस बहुरंगी रंगमंच पर अक्सर वह अभिनेता सबसे पहले नेपथ्य में धकेल दिया जाता है, जिसके पास स्क्रिप्ट से बाहर जाकर सच बोलने का हुनर और किरदार को जीवंत करने की दृष्टि होती है। शेक्सपियर के किसी त्रासद नाटक की तरह या फिर पुरानी श्वेत-श्याम फिल्मों के उस दृश्य की मानिंद, जहां काबिल वजीर को देखकर पूरी दरबारी जमात एकमत होकर खामोश साजिशों के जाल बुनने लगती है—उदयपुर नगर निगम के इस चुनावी दंगल में भी ठीक वैसा ही एक मंजर देखने को मिला।

दास्तान भाजपा नेता अनिल सिंघल की है। एक ऐसा किरदार, जिसके वार्ड 29 में कदम रखते ही उदयपुर से लेकर जयपुर के सत्ता-गलियारों तक बैठे तमाम ‘भावी मेयरो’ के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। डर इस बात का नहीं था कि वे चुनाव हार जाएंगे, खौफ इस बात का था कि अगर यह शख्स जीत गया, तो मेयर की कुर्सी पर बाकी तमाम दावेदारों के सजे-सजाए ख्वाब ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएंगे।

दावेदारों की लामबंदी और खामोश सियासत

वार्ड 29 के अखाड़े में जब पूर्व डिप्टी मेयर पारस सिंघवी, वैभव भंडारी और राजेश अग्रवाल अपनी-अपनी गोटियां बिछा रहे थे, तभी अनिल सिंघल के नाम की गूंज ने पूरे समीकरण को हिला दिया। पार्टी के भीतर की यह पुरानी रवायत रही है कि जब कोई कद्दावर और बेबाक चेहरा सामने आता है, तो औसत दर्जे के दावेदार अपने तमाम आपसी मतभेद भूलकर ‘सांझा मोर्चा’ बना लेते हैं। यहां भी वही हुआ। ऐसी घेराबंदी की गई कि पैनल में सबसे अव्वल और दमदार होने के बावजूद सिंघल के हाथ से पार्षद का टिकट ही सरका दिया गया। इसे राजनीति की भाषा में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कहें या असुरक्षा की पराकाष्ठा!

हैरानी इस बात पर भी है कि शहर के सियासी रहनुमा इस पूरे ड्रामे में मूकदर्शक बने रहे। शहर विधायक ताराचंद जैन, जिनकी नजदीकियों की मिसालें दी जाती रहीं, वे भी इस राजनीतिक चक्रव्यूह में असहाय नजर आए। तीन बार के विधायक फूल सिंह मीणा और सांसद मन्नालाल रावत की जुबान पर भी जाने कौन-सी अदृश्य मजबूरी का ताला लगा था कि सब कुछ जानते-बूझते हुए भी वे मौन साधना में लीन रहे। पंजाब के राजभवन में बैठे गुलाबचंद कटारिया की रजामंदी और प्रदेश नेतृत्व की हरी झंडी भी उस ‘लोकल लॉबिंग’ के तिलिस्म को नहीं तोड़ सकी, जिसका एकमात्र मकसद सिंघल को रेस से बाहर रखना था।

विजन की सजा और पारिवारिक रिश्तों का आईना

मेरा अनिल सिंघल से केवल एक राजनीतिक विश्लेषक भर का वास्ता नहीं है; उनसे पारिवारिक रिश्ते और दशकों की आत्मीय निकटता भी रही है। इसलिए उनके इस सफर, उनकी फितरत और उनके विजन को मैंने बेहद करीब से देखा है। यह वही शख्स हैं, जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन के दौर में गैर-भाजपाई हुकूमतों की नीतियों पर अपने तीखे व्यंग्य बाणों से अखबारों के पन्नों को धार दी थी और कटारिया साहब के चार-चार चुनावी अभियानों की रीढ़ बने थे।

जब वे पार्षद और गैराज समिति के अध्यक्ष बने, तो उन्होंने व्यवस्था को केवल चलाया नहीं, बल्कि बदला था। नगर निगम के बेड़े में नए फायर स्टेशन की नींव डालना, आवारा पशुओं के लिए व्यवस्थित गौशाला का निर्माण, ट्रेंचिंग ग्राउंड का कायाकल्प, निगम के तमाम वाहनों का एक तय रंग-रोगन और लॉग बुक की कड़ाई—ये वो जमीनी काम थे जिनकी तारीफ कभी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने खुले दिल से की थी।

पर अफसोस, आज की सियासत में काम का रिपोर्ट कार्ड नहीं, बल्कि यह देखा जाता है कि कौन कितना ‘सुलभ और हानिरहित’ है। अनिल सिंघल का कद, उनका बेबाक मिजाज और उनका प्रशासनिक विजन ही आज उनके आड़े आ गया। नगर निगम के महत्वाकांक्षी दावेदारों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए एक ऐसे मोहरे को ही बिसात से बाहर कर दिया, जो खेल का रुख मोड़ने का माद्दा रखता था।

रंगमंच का पर्दा भले ही इस अंक के लिए गिर गया हो, मगर इतिहास गवाह है कि जो लोग अपने दम पर पहचान बनाते हैं, उनकी अहमियत किसी चुनावी टिकट की मोहताज नहीं होती। डर की नींव पर रखी गई सियासत की इमारतें अक्सर पहली ही बारिश में दरक जाया करती हैं।

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