
फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के साथ सैयद हबीब, उदयपुर।
कहते हैं कि सिनेमा और स्थापत्य (आर्किटेक्चर) में एक अजीब सी समानता होती है। दोनों ही इंसान के सपनों को एक ठोस आकार देते हैं। जब के. आसिफ ने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बनाई, तो उन्होंने सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि शीशमहल के रूप में एक ऐसा ख्वाब बुना जो आज भी अमर है। सादगी और भव्यता का ऐसा ही एक नया महाकाव्य इन दिनों झीलों की नगरी उदयपुर के शोभागपुरा स्थित जे.के. सर्किल पर आकार ले रहा है—नाम है ‘आर्किटेक्ट्स टॉवर’।
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने कभी ताजमहल को देखकर लिखा था— “एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़”। लेकिन उदयपुर में रचा जा रहा यह नया इतिहास किसी शहंशाह की विलासिता नहीं, बल्कि सभ्यता की नींव रखने वाले उन गुमनाम और महान शिल्पियों को एक संगीतमय सलाम है, जिन्होंने इस दुनिया को खूबसूरत बनाया। यह देश का पहला ऐसा सार्वजनिक स्मारक होगा, जो किसी राजा-महाराजा के नाम नहीं, बल्कि समूचे आर्किटेक्ट और डिज़ाइनर समुदाय को समर्पित है।
सूत्रधार सुनील लड्ढा: सपनों का वो ‘राज कपूर’ जिसने समय को बांधने की ठानी
फिल्म ‘तीसरी क़सम’ में हीरामन कहता है कि मन की बात समझने के लिए दिल की आँखें चाहिए। इस पूरी परियोजना के मुख्य सूत्रधार और प्रख्यात आर्किटेक्ट सुनील लड्ढा भी स्थापत्य की दुनिया के एक ऐसे ही ‘शोमैन’ या ‘राज कपूर’ की तरह उभरे हैं, जिन्होंने पत्थरों में जान फूंकने का एक गज़ब का सपना संजोया है। उनके इस सिनेमाई विज़न को ज़मीन पर उतारने में डॉ. विनोद जसकरण पोरवाल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ. विनोद पोरवाल ने एक कड़क ‘प्रोड्यूसर’ की तरह अपना पूरा सहयोग दिया है, जिन्होंने विधि-विधान से पूजा कर इस ऐतिहासिक रील का पहला क्लैपशॉट (शिलान्यास) किया। साथ ही तकनीकी सहयोगी प्रियंका कोठारी इस फिल्म की कुशल ‘एसोसिएट डायरेक्टर’ की तरह तकनीकी बारीकियों को संभाल रही हैं।
डॉ. विनोद पोरवाल ने इस मौके पर जो बात कही, वह जय प्रकाश चौकसे जी की डायरी के किसी पन्ने जैसी ही मुकम्मल लगती है:
“किसी भी समाज की पहचान उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने वाले रचनाकारों से होती है।”
‘जंतर-मंतर’ का वो जादू और ‘वक़्त’ की धूप-छांव
इस 35 फीट ऊंचे टॉवर की सबसे बड़ी और जादुई यूएसपी (USP) है—इसमें स्थापित होने वाली वर्टिकल सन डायल (धूप घड़ी)। इसे देखकर सहसा फिल्म ‘वक़्त’ का वह मशहूर गाना याद आ जाता है— “आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू, जो कुछ भी है, बस यही एक पल है”।

यह धूप घड़ी जयपुर के ऐतिहासिक जंतर-मंतर की वैज्ञानिक विरासत से प्रेरित है। सूरज की किरणें जब इस टॉवर पर पड़ेंगी, तो उसकी ढलती-बढ़ती परछाई इंसानों को वक्त का अहसास कराएगी। यह उदयपुर का एक नया ‘घंटाघर’ तो होगा ही, लेकिन इसमें कोई मशीन या सुइयां नहीं होंगी; बल्कि खुद कुदरत और समय मिलकर जुगलबंदी करेंगे। विज्ञान, कला और अध्यात्म का ऐसा संगम सिनेमा के रूपहले पर्दे पर भी दुर्लभ होता है।
महान ‘मंडन’ को ट्रिब्यूट: इतिहास के कैनवास पर नई इबारत
यदि मेवाड़ का इतिहास एक क्लासिक ब्लॉकबस्टर फिल्म है, तो 15वीं शताब्दी के महान वास्तुविद आचार्य मंडन उसके सबसे बड़े स्क्रीनराइटर और आर्ट डायरेक्टर थे। कुंभलगढ़ जैसा अजेय दुर्ग और उसकी 36 किलोमीटर लंबी दीवार को कल्पित करने वाले मंडन की स्मृतियों को यह टॉवर समर्पित है।

सुनील लड्ढा का यह कंसेप्ट सिर्फ उदयपुर के एक चौराहे को चमकाने के लिए नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के क्रिएटिव माइंड्स को एक अलग पहचान दिलाने का एक जज़्बाती जरिया है।
क्लाइमैक्स नोट : जब यह ‘आर्किटेक्ट्स टॉवर’ बनकर पूरी तरह तैयार होगा, तो यह केवल पर्यटकों के लिए एक ‘विज़िटिंग स्पॉट’ नहीं रहेगा। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बनेगा, जहाँ बैठकर कोई भी नौजवान आर्किटेक्ट गुनगुना सकेगा— “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई…” और उसे अहसास होगा कि भगवान विश्वकर्मा से शुरू हुई इस सृजन की परंपरा को आगे बढ़ाना ही इस जीवन का सबसे हसीन सिनेमा है।
सुनील लड्ढा की शख्सियत के बारे में जानने के लिए आप पढ़ते रहिएगा हबीब की रिपोर्ट
About Author
You may also like
उदयपुर नगर निगम चुनाव : तीन दशकों से अजेय रहे भाजपाई किले में टिकट वितरण की जंग, पंजाब राजभवन तक पहुंचा हर वार्ड का आंतरिक फीडबैक
कमबैक अनिल सिंघल
उदयपुर में 6 सितंबर को सजेगा खेल का महामंच: वेदांता जिंक सिटी हाफ मैराथन की आधिकारिक जर्सी और पोस्टर का भव्य अनावरण
पर्दे के पीछे : उदयपुर निकाय चुनावी उत्सव की पटकथा और शह-मात का सिनेमा
उदयपुर में लोक देवता सगस जी बावजी के प्राकट्य दिवस की धूम : सुबह से लगी दर्शनार्थियों की लंबी कतारें, गूंजे जयकारे
