
80 वार्ड, 600 दावेदार और गुलाबचंद कटारिया की सियासी धुरी
उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर में आगामी नगर निगम चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। नगर निगम के 80 वार्डों के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) में टिकट की होड़ इस कदर मची है कि अब तक 600 से अधिक दावेदारों के आवेदन जिला संगठन तक पहुंच चुके हैं। पार्षद से लेकर महापौर (मेयर) पद की दावेदारी तक पार्टी के भीतर मची रस्साकशी ने यह साफ कर दिया है कि असली मुकाबला विपक्ष से पहले संगठन के अंदरूनी समीकरणों को साधने का है।
तीन दशकों का वर्चस्व और ओवर-कॉन्फिडेंस का खतरा
उदयपुर नगर निगम (पूर्व में नगर परिषद) पर पिछले 30 वर्षों से लगातार भारतीय जनता पार्टी का कब्जा रहा है। इस अजेय रिकॉर्ड के चलते भाजपा का एक बड़ा खेमा इस बार भी ‘बोर्ड बनना तय’ मानकर अति-आत्मविश्वास (ओवर-कॉन्फिडेंस) में दिख रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी फिलहाल ‘साइलेंट मोड’ में रहकर भाजपा की गुटबाजी और टिकट वितरण से उपजने वाले असंतोष का इंतजार करती नजर आ रही है।
कटारिया: भले ही संवैधानिक पद पर, पर उदयपुर की नब्ज पर अब भी पकड़
उदयपुर की शहरी राजनीति में गुलाबचंद कटारिया का प्रभाव निर्विवाद माना जाता रहा है। तीन दशकों तक पार्टी को स्थानीय निकाय की सत्ता में बनाए रखने के पीछे उनका संगठनात्मक कौशल और हर वार्ड के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद मुख्य आधार रहा है।
तुरुप का इक्का: वर्तमान में पंजाब के राज्यपाल के रूप में संवैधानिक दायित्व संभालने के बावजूद कटारिया का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। शहर विधायक ताराचंद जैन के जरिए स्थानीय राजनीति पर उनकी मजबूत पकड़ बरकरार है।
वार्ड-वार ग्राउंड रिपोर्ट: सूत्रों के अनुसार, भले ही दावेदार जयपुर से लेकर स्थानीय स्तर तक लॉबिंग कर रहे हों, लेकिन 80 वार्डों के वास्तविक सामाजिक, जातीय और राजनीतिक समीकरणों का विस्तृत फीडबैक कटारिया तक पहुंच चुका है।
उदयपुर आगमन पर टिकी निगाहें
गुलाबचंद कटारिया के उदयपुर प्रवास को लेकर शहर के सियासी गलियारों में भारी उत्सुकता है। विभिन्न गुटों के समर्थक और टिकट के दावेदार उनसे मिलने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने की तैयारी में हैं। वर्तमान में भाजपा जिला कार्यालय में जिलाध्यक्ष और प्रभारियों से मिलने वालों का तांता लगा हुआ है, जहां सभी को निष्पक्ष चयन का आश्वासन दिया जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का आकलन: संतुलन ही तय करेगा जीत
स्थानीय विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि टिकट वितरण में कटारिया खेमे और उनके व्यापक अनुभव व फीडबैक को दरकिनार किया गया, तो भाजपा के लिए बोर्ड बनाने की राह बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकती है। नगर निगम में बगावत और भितरघात को रोकने के लिए संगठन को अनुभवी नेतृत्व और नए चेहरों के बीच कड़ा संतुलन साधना होगा।
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