पर्दे के पीछे : मंझे हुए डायरेक्टर की फ्लॉप ‘शो-रील’ बनता लेकसिटी का मेला

उदयपुर। सिनेमा का एक पुराना और आजमाया हुआ उसूल है—जब कोई बड़ा फिल्मकार अपनी पुरानी कामयाबियों के खुमार में यह मान बैठता है कि सिर्फ बड़े सितारों के नाम भर से दर्शक सिनेमाघर की टूटी कुर्सियों और बदइंतजामी को भूल जाएंगे, तो बॉक्स ऑफिस पर हादसा तय होता है। राज कपूर साहब ने कभी ‘मेरा नाम जोकर’ बनाई थी, उसमें दिल था, फलसफा था, मगर पहली रिलीज के वक्त वो वक्त की नब्ज और दर्शकों के सब्र का सही पैमाना नहीं नाप पाए थे। उदयपुर नगर निगम के टाउन हॉल प्रांगण में दीपावली मेले की आखिरी शाम यानी कवि सम्मेलन का दृश्य भी कुछ-कुछ वैसा ही रहा—मानो किसी मंझे हुए, तपे-तपाए निर्देशक ने सितारे तो ‘ए-लिस्टर’ बुला लिए, मगर थिएटर का पर्दा ही छोटा पड़ गया और प्रोजेक्टर बीच शो में हांफने लगा।

उदयपुर अब वो सत्तर के दशक वाला शांत, छोटा कस्बा नहीं रहा जहां पचास-पचपन पार्षदों के दौर में मेला प्रांगण में चंद दरियां बिछाकर शहर को समेट लिया जाता था। शहर परिधि लांघकर अस्सी वार्डों का विशाल महानगर बन चुका है। आबादी का समंदर उमड़ रहा है। और सबसे दिलचस्प बात यह कि इस बार नगर निगम के तख्त पर जो शख्स बतौर महापौर (डायरेक्टर) बैठे हैं—पारस सिंघवी—वे कोई पहली बार कैमरे के पीछे खड़े हुए नौसिखिए नहीं हैं। पांचवीं बार के चुने हुए पार्षद हैं, पंद्रह सालों से इसी मेले के नेपथ्य और मंच की बारीकियों को अपनी आंखों से देखते आए हैं। उनसे उम्मीद थी कि वे शहर के बदलते कैनवास के मुताबिक एक 70 एमएम का भव्य ‘सिनेमास्कोप’ ढांचा खड़ा करेंगे। मगर अफ़सोस, मंझे हुए खिलाड़ी के हाथ से भी बाजी ऐसे फिसली कि आयोजन अपनी ही अव्यवस्था के बोझ तले चरमरा गया।

शाम ढलते ही जब शैलेश लोढ़ा, विष्णु सक्सेना और संजय झाला जैसे मंझे हुए फनकारों को सुनने के लिए शहर का हुजूम उमड़ा, तो रात 9 बजते-बजते मेला प्रांगण ठसाठस भर गया। फिर जो हुआ, वो किसी बी-ग्रेड ड्रामे की स्क्रिप्ट जैसा था। वीआईपी के लिए सजाए गए मखमली सोफों और कुर्सियों पर आम तमाशबीन काबिज हो गए। हालात ऐसे बिगड़े कि खुद मेयर साहब को मंच पर आकर माइक थामना पड़ा और गुजारिश करनी पड़ी कि ‘मेहमानों की जगह छोड़ दीजिए।’ जब गुहार काम नहीं आई, तो चेतावनियों का सहारा लेना पड़ा। कुछ लोग झेंपकर उठे, तो कुछ को बाकायदा उठाना पड़ा। खासमखास मेहमानों के लिए आनन-फानन में प्लास्टिक की कुर्सियों का जुगाड़ किया गया और पुलिस को रास्ता बनाने के लिए पसीने बहाने पड़े। गुरुदत्त की ‘कागज़ के फूल’ का वो मायूस मंजर याद आता है, जहाँ सब कुछ होकर भी व्यवस्था का तारतम्य बिखर चुका होता है।

मगर इन तमाम लचर इंतजामात और बदरंग व्यवस्था के बावजूद, अगर यह शाम पूरी तरह डूबने से बची, तो सिर्फ और सिर्फ उन अदाकारों के दम पर, जिन्होंने मंच से अपनी रूह झोंक दी। जब शैलेश लोढ़ा ने माइक थामा, तो उनकी व्यंग्य की धार ने अव्यवस्था की कड़वाहट पर हंसी का मरहम लगाया। संजय झाला ने जब पारिवारिक रिश्तों की नब्ज टटोलते हुए कहा कि ‘भाई की हंसी ताकत सवाई है… और लुगाई की हंसी जेब की सफाई है’, तो ठहाकों ने प्रांगण की दीवारें हिला दीं। हाथरस के विष्णु सक्सेना ने प्रेम और संवेदना की डोर खींचते हुए जब आगाह किया कि ‘जब भी छुओ बुलंदियां तो ध्यान ये रखना, जमीं से पांव का रिश्ता न टूटने पाए’, तो लगा कि यह नसीहत सिर्फ आशिकों के लिए नहीं, बल्कि कुर्सी और सत्ता के गुरूर में जमीन की हकीकत भूल चुके हुक्मरानों के लिए भी है।

शशि श्रेया के श्रृंगार ने पत्थरों पर लकीरें खींचीं, तो जगदीश सोलंकी की ओजस्वी पंक्तियों और राव अजातशत्रु की मेवाड़ी गौरवगाथा ने लहू में देशभक्ति की रवानी भर दी। चेतन चर्चित ने भी दर्द को हंसी में छुपाने का हुनर सिखाया।

मंच पर कला की गंगा बहती रही, श्रोता गुलाबी ठंड में भी जमे रहे, लेकिन पर्दा गिरते-गिरते यह सवाल हवा में तैरता छोड़ गया—क्या लेकसिटी का प्रशासन केवल पुराने ढर्रे और पुरानी रीलों पर ही गाड़ी चलाएगा? जब दर्शक बढ़ जाएं और कहानी बड़ी हो जाए, तो थिएटर का दायरा बदलना पड़ता है। अगर मंझे हुए तजुर्बेकार भी वक्त की जरूरत को न भांप सकें, तो तालियों के शोर के पीछे हमेशा अव्यवस्था की एक चुभने वाली सीटी सुनाई देती ही रहेगी।

 

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