जंग के खिलाफ जंग : हिंदुस्तान जिंक के नए एलॉय और भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर इकोनॉमिक्स

जयपुर। यदि आप भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक सेहत समझना चाहते हैं, तो दलाल स्ट्रीट के सूचकांकों या जीडीपी के तिमाही आंकड़ों के बजाय उन बुनियादी तत्वों पर नज़र डालिए जिनसे यह देश खड़ा हो रहा है। भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक है। हम लाखों किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल, बंदरगाह, ट्रांसमिशन लाइनें और आधुनिक रेलवे नेटवर्क बिछा रहे हैं। लेकिन इस भारी-भरकम पूंजीगत व्यय (Capex) के पीछे एक छिपा हुआ दीमक है, जिसे अर्थशास्त्री अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं—और वह है जंग (Corrosion)।

अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक, जंग के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान किसी भी विकासशील देश की जीडीपी का 3 से 4 फीसदी तक निगल जाता है। भारत जैसे विशाल तटीय और मानसूनी देश में यह नुकसान सालाना खरबों रुपये का बैठता है। ऐसे में वेदांता समूह की अग्रणी एकीकृत उत्पादक हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड द्वारा जयपुर में लॉन्च किए गए दो नए जिंक एलॉय—’वेदएज’ (VedAZ) और ‘वेदआयुष’ (VedAyush)—केवल कॉर्पोरेट उत्पाद नहीं हैं, बल्कि यह भारत के पूंजीगत ढांचे के क्षरण को रोकने की दिशा में एक ठोस औद्योगिक कदम हैं।

सस्ते कच्चे माल से हाई-मार्जिन वैल्यू एडिशन की ओर

अर्थशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है: जब आप केवल कच्चा माल (कमोडिटी) बेचते हैं, तो आपकी कीमत वैश्विक मांग और आपूर्ति के उतार-चढ़ाव पर निर्भर होती है। लेकिन जब आप उसी कच्चे माल को तकनीकी विशेषज्ञता से विशिष्ट औद्योगिक जरूरत (Value-Added Product) में बदल देते हैं, तो आप ‘प्राइस टेकर’ से ‘प्राइस मेकर’ बन जाते हैं।

हिंदुस्तान जिंक के सीईओ और पूर्णकालिक निदेशक अमरेंदु प्रकाश इसी आर्थिक गणित को साध रहे हैं। ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, ट्रांसमिशन और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को अब केवल साधारण गैल्वनाइज्ड स्टील नहीं चाहिए; उन्हें ऐसा स्टील चाहिए जो तटीय नमक, नमी और औद्योगिक रसायनों के बीच दशकों तक टिक सके।

वेदएज (VedAZ): लागत घटाने की इंजीनियरिंग :

यह जिंक-एल्यूमिनियम मास्टर एलॉय गैल्वनाइजिंग प्रक्रिया के परिचालन अर्थशास्त्र (Operational Economics) को सुधारता है। गैल्वनाइजिंग बाथ में एल्यूमिनियम के सटीक नियंत्रण से कोटिंग की मोटाई एक समान रहती है। सबसे अहम बात यह है कि यह उत्पादन के दौरान जिंक की बर्बादी और अवशेष (Dross) को कम करता है। औद्योगिक विनिर्माण में अवशेष कम होने का सीधा मतलब है प्रति टन उत्पादन लागत में कमी और संसाधनों की बचत।

वेदआयुष (VedAyush): चरम परिस्थितियों के लिए ‘शील्ड’ :

यह जिंक-एल्यूमिनियम-मैग्नीशियम आधारित एलॉय है। धातु विज्ञान की दृष्टि से मैग्नीशियम सतह पर एक अत्यधिक स्थिर जंग-रोधी परत बनाता है। इसका सीधा आर्थिक लाभ यह है कि तटीय इलाकों, बंदरगाहों और अत्यधिक नमी वाले क्षेत्रों में लगाए जाने वाले स्टील स्ट्रक्चर की उम्र दोगुनी तक बढ़ सकती है। लंबी उम्र का मतलब है बार-बार होने वाले रखरखाव और प्रतिस्थापन खर्च में सीधी कटौती।

राजपुरा-दरीबा से घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती

रणनीतिक रूप से, यह कदम भारत को महत्वपूर्ण औद्योगिक धातुओं के मामले में आत्मनिर्भर बनाता है। हिंदुस्तान जिंक अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई ‘हिंदुस्तान जिंक एलॉयज प्राइवेट लिमिटेड’ (HZAPL) के तहत राजस्थान के राजपुरा-दरीबा में 30,000 टन वार्षिक क्षमता वाला आधुनिक एलॉय मेल्टिंग और कास्टिंग संयंत्र संचालित कर रही है।

कंपनी के पोर्टफोलियो में पहले से मौजूद HZA-3 और BIS प्रमाणित HZA-5 डाई-कास्टिंग ग्रेड पहले से ही ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के सटीक पुर्जों में इस्तेमाल हो रहे हैं। अब ‘वेदएज’ और ‘वेदआयुष’ के जुड़ने से उन विशेष एलॉय का घरेलू उत्पादन सुनिश्चित होगा, जिनके लिए भारतीय उद्योगों को अक्सर आयात पर निर्भर रहना पड़ता था या फिर साधारण कोटिंग से काम चलाना पड़ता था।

जब किसी देश में अरबों डॉलर का बुनियादी ढांचा तैयार हो रहा हो, तो असली चुनौती केवल निर्माण की नहीं, बल्कि उसके संरक्षण की होती है। यदि बेहतर मेटालर्जी के जरिए हम स्टील की उम्र 10-15 साल भी बढ़ा पाते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की बैलेंस शीट में बड़ी बचत के रूप में दर्ज होता है। हिंदुस्तान जिंक का यह दांव इसी दीर्घकालिक आर्थिक समीकरण को दुरुस्त करने की एक सटीक पहल है।

 

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