
बिलाड़ा (जोधपुर)। नियति का खेल भी कितना क्रूर होता है, इसका अंदाज़ा बिलाड़ा कस्बे में हुई इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना से लगाया जा सकता है। एक घर, जहाँ कुछ पल पहले तक शहनाइयाँ गूँजने वाली थीं, सोहर गाए जाने वाले थे, वहाँ अब सिर्फ़ चीत्कार और सन्नाटा पसरा है। एक मासूम, जिसके सिर पर ‘मुंडन’ का पवित्र जल पड़ना था, उसकी अर्थी उठते देख आज पत्थर भी रो पड़े। बेंगलुरु से अपनों के बीच खुशियाँ बाँटने आया परिवार, अब ताउम्र का गम लेकर लौटेगा।
पंचोलियों का बास निवासी विष्णु जांगिड़ के घर में उत्सव का माहौल था। हर कोई मुंडन संस्कार और गृह प्रवेश की तैयारियों में मग्न था। इसी गहमागहमी और खुशियों के शोर-शराबे के बीच, ३ वर्षीय मासूम हितार्थ घर के बाहर खेलते-खेलते सबकी नज़रों से ओझल हो गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह अबोध बालक मौत के इतने करीब खेल रहा है। वह खेलते-खेलते घर के पास ही खड़ी अपने पिता की कार के अंदर जाकर बैठ गया। नादानी में दरवाजा अंदर से लॉक हो गया, और वहीं से शुरू हुआ मौत का वह भयावह दौर, जिसे सोचकर ही रूह काँप उठती है।
बंद कार की तपन में घुटता रहा ‘हितार्थ’ का दम
करीब डेढ़ घंटे बाद, जब खुशियों के बीच अचानक हितार्थ की याद आई, तो चारों तरफ हड़कंप मच गया। तलाश शुरू हुई, लेकिन वह कहीं नहीं मिला। अंततः, जब नज़दर कार पर पड़ी, तो परिजनों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हितार्थ कार के अंदर बेसुध पड़ा था। उसे तुरंत स्थानीय ट्रोमा सेंटर ले जाया गया, लेकिन कुदरत अपना फैसला सुना चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
भीषण गर्मी और ‘दमघोंटू’ मौन
विशेषज्ञों के अनुसार, बंद कार में तापमान कुछ ही मिनटों में भट्टी जैसा हो जाता है। बाहर की भीषण गर्मी और कार के अंदर का बढ़ता तापमान मासूम के लिए काल बन गया। एयरफ्लो बंद होने के कारण ऑक्सीजन की कमी हो गई और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर तेज़ी से बढ़ा। हितार्थ का नन्हा शरीर, वयस्कों की तुलना में तापमान और ऑक्सीजन की कमी के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारण, इस घातक परिस्थिति को सहन नहीं कर सका। उस बंद, अंधेरी और तपती हुई कार में, वह मासूम तड़पता रहा, मदद के लिए पुकारता रहा होगा, लेकिन उसकी आवाज़ जश्न के शोर में दबकर रह गई।
एक ‘भूल’ और उम्र भर का ‘मलाल’
यह हृदयविदारक घटना सिर्फ़ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासन और जनता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी एक मिनट की लापरवाही, एक मासूम की जान ले सकती है। खुशियाँ कब मातम में बदल जाएँ, कोई नहीं जानता। हितार्थ की मौत ने जांगिड़ परिवार को ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया है। बेंगलुरु से खुशियाँ मनाने आया यह परिवार अब सिर्फ़ यादों का बोझ लेकर लौटेगा। इस मामले में पुलिस को कोई लिखित शिकायत नहीं दी गई है, लेकिन हितार्थ की खामोश मौत का सवाल हवा में तैर रहा है—क्या हम अपने बच्चों की सुरक्षा के प्रति वाकई सतर्क हैं?
सबक जो हमें सीखना होगा :
खड़ी कार को कभी भी खुला न छोड़ें। बच्चों को कार के आसपास या उसके अंदर अकेले न खेलने दें। कार पार्क करते समय हमेशा खिड़कियाँ थोड़ी खुली रखें या वेंटिलेशन सुनिश्चित करें।
बिलाड़ा की इस घटना ने हमें एक दर्दनाक सबक सिखाया है। काश, हम इस सबक को पहले सीख पाते, तो आज हितार्थ हमारे बीच होता और विष्णु जांगिड़ के घर में शहनाइयाँ गूँज रही होतीं।
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