पूर्व सभापति रवींद्र श्रीमाली ने खुद को चुनावी दौड़ से अलग कर पेश किया बड़प्पन, 4 बार पार्षद रहे नेताओं में मची टिकट की होड़

 

उदयपुर। नगर निकाय चुनावों की सुगबुगाहट तेज होते ही शहर की सियासत में पदलोलुपता और अंतहीन महत्वाकांक्षाओं का पुराना खेल एक बार फिर सतह पर आ गया है। जहां एक तरफ पार्टी के कई ऐसे ‘सदाबहार’ चेहरे हैं जो दो से चार बार पार्षद रहने, संगठन के शीर्ष पदों का सुख भोगने और विधानसभा की दावेदारी करने के बाद भी एक नहीं बल्कि दो-दो वार्डों से टिकट हथियाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं; वहीं दूसरी तरफ पूर्व सभापति, पूर्व जिलाध्यक्ष और पूर्व यूआईटी चेयरमैन रवींद्र श्रीमाली ने एक अनुकरणीय और प्रेरक मिसाल पेश की है। उन्होंने आगामी निकाय चुनाव में किसी भी वार्ड से अपनी दावेदारी न रखकर त्याग, बड़प्पन और संगठनात्मक निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।

‘मैं ही सब कुछ’ : संगठन और सत्ता दोनों पर एकसाथ नजर

चुनावी बिगुल बजते ही पार्टी में दावेदारी की ऐसी होड़ मची है कि पुराने चेहरों का मोह छूटने का नाम नहीं ले रहा है:

दो-दो वार्डों में बायोडाटा : स्थिति यह है कि कई वरिष्ठ पूर्व पार्षद अपने मूल वार्ड की जमीनी हवा को भांपते हुए ‘सुरक्षित ठौर’ की तलाश में एक साथ दो-दो वार्डों में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।

संगठन के पदों पर काबिज नेताओं की दावेदारी : जिलाध्यक्ष, महामंत्री, उपाध्यक्ष और मंत्री जैसे जिम्मेदार सांगठनिक पदों पर बैठे कई पदाधिकारी भी पार्षद और मेयर की दौड़ में सबसे आगे नजर आ रहे हैं, मानो संगठन में अन्य कार्यकर्ताओं का कोई अस्तित्व ही न हो।

रवींद्र श्रीमाली का बड़प्पन और त्याग की प्रेरक नजीर

निकाय चुनावों की घोषणा के साथ ही मीडिया और राजनीतिक गलियारों में रवींद्र श्रीमाली का नाम संभावित प्रमुख चेहरों में सबसे आगे चल रहा था और कई वरिष्ठ नेताओं की नजरें उनके रुख पर टिकी थीं। लेकिन श्रीमाली ने स्वेच्छा से खुद को चुनावी दौड़ से बाहर रखकर एक स्वस्थ और सकारात्मक संदेश दिया है।

श्रीमाली ने साफ और शालीन शब्दों में कहा कि वे संगठन और स्थानीय प्रशासन के तमाम सर्वोच्च पदों—सभापति, जिलाध्यक्ष और यूआईटी चेयरमैन—पर रहकर सेवा दे चुके हैं। ऐसे में उनका कर्तव्य बनता है कि वे स्वयं पीछे हटें और उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए मार्ग प्रशस्त करें, जिन्होंने दशकों तक संगठन की नींव को मजबूत करने के लिए जमीन पर पसीना बहाया है लेकिन उन्हें आज तक मुख्यधारा में अपनी योग्यता साबित करने का अवसर नहीं मिला। उनका यह कदम उन नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो हर चुनाव को केवल अपनी निजी महत्वाकांक्षा का जरिया मानते हैं।

कार्यकर्ताओं का सवाल : क्या पार्टी अपनाएगी त्याग और मर्यादा की नीति?

श्रीमाली के इस अनुकरणीय कदम के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या संगठन स्तर पर भी कुछ स्पष्ट नीतियां बनाई जानी चाहिए:

नए चेहरों को अवसर : जो नेता दो या उससे अधिक बार पार्षद रह चुके हैं, क्या वे श्रीमाली के बड़प्पन से प्रेरणा लेकर नए और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं के लिए रास्ता छोड़ेंगे?

संगठन बनाम चुनावी पद : क्या संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे पदाधिकारियों को टिकट की दावेदारी से पहले अपने दायित्वों से मुक्त किया जाएगा?

वार्ड की स्थानीयता : क्या प्रत्याशियों को केवल उसी वार्ड तक सीमित रखा जाएगा जहां उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज है, ताकि ‘पैराशूट’ दावेदारों पर रोक लग सके?

श्रीमाली का यह कदम साबित करता है कि राजनीति में पद से बड़ा स्थान त्याग और बड़प्पन का होता है, जिससे न केवल संगठन की गरिमा बढ़ती है बल्कि नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं में भी नया विश्वास पैदा होता है।

 

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