दास्तान-ए-सुनैना: जब खामोश हो गई सज्जनगढ़ की दहाड़… तन्हा सम्राट की पथराई आंखें और अरावली की छाती में गूंजता सन्नाटा

उदयपुर। अरावली की हरी-भरी वादियों के बीच बसी सज्जनगढ़ लॉयन सफारी में आज एक ऐसी खामोशी पसरी है, जो पत्थरों का भी सीना चीर दे। जिस बाड़े में कभी जिंदगी अपनी पूरी शान और रवानी के साथ दहाड़ती थी, वहां आज सिर्फ एक गहरी, बेबस और असहनीय तन्हाई बाकी रह गई है। साढ़े पांच साल की खूबसूरत एशियाटिक शेरनी सुनैना अब हमेशा के लिए गहरी नींद सो चुकी है। मौत से तीन महीने तक जिंदगी की जंग लड़ने के बाद आखिरकार इस बेजुबान साथी ने अपनी आंखें सदा के लिए मूंद लीं।

उम्मीद की लौ और अचानक गहराया अंधेरा

बीते 24 मई से सुनैना की सांसें बीमारी के दर्द से जूझ रही थीं। डॉक्टरों की टीम, रात-दिन देखभाल करने वाले केयरटेकर्स और पूरे वन अमले ने उसे बचाने में अपना सब कुछ झोंक दिया था। एक महीना—21 जुलाई से 20 अगस्त तक—ऐसा भी गुजरा जब लगा कि दुआएं कुबूल हो गई हैं। सुनैना उठने लगी थी, पूरा भोजन लेने लगी थी और उसकी आंखों में फिर से वही चमक लौटने लगी थी।

लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। 21 अगस्त की सुबह उसने भोजन की थाली से मुंह मोड़ लिया। डॉक्टरों ने फिर से जांचें कीं, दवाइयों की ताकत बढ़ाई, नसों में जिंदगी लौटाने की हर मुमकिन कोशिश हुई। पर रविवार की दोपहर अचानक उसकी सांसें उखड़ने लगीं और देखते ही देखते सुनैना ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। जब डॉक्टरों के तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड (डॉ. शैलेन्द्र शुक्ला, डॉ. महेन्द्र मेहता और डॉ. हिमांशु व्यास) ने उसके बेजान जिस्म का परीक्षण पूरा किया, तो हर आंख आंसुओं से भीग चुकी थी।

धुएं के साथ विदा हुई ‘सफारी की शान’

रविवार शाम छह बजे जब जैविक उद्यान परिसर के श्मशान स्थल पर सुनैना को मुखाग्नि दी गई, तो मुख्य वन संरक्षक मुकेश सैनी, रेंजर प्रभुलाल मीणा और तमाम वनकर्मियों के हाथ कांप रहे थे। जो हाथ उसे पुचकारते थे, आज उन्हीं हाथों को उसे विदा करना पड़ा। धधकती चिता की लपटों के साथ अरावली की हवाओं में मानो एक भारी सिसकी तैर गई।

सम्राट की वीरान दुनिया और 25 साल पुराना दर्द

इस पूरी दास्तान का सबसे मार्मिक और दिल चीर देने वाला मंजर उस बाड़े में है, जहां अब बब्बर शेर ‘सम्राट’ अकेला रह गया है। 16 फरवरी को जब दोनों को इस नई दुनिया में लाया गया था, तो दोनों का साथ इस सफारी की जान था। आज सम्राट अपने बाड़े के उस कोने को बार-बार निहारता है, जहां सुनैना बैठा करती थी। उसकी शांत, पथराई आंखें जैसे हर आहट पर अपनी साथी को ढूंढ रही हैं।

यह दृश्य उदयपुर को 25 साल पुराने उस जख्म की याद दिला गया, जब गुलाबबाग जंतुआलय में शेर धर्मेंद्र ने शेरनी हेमा का साथ छोड़ दिया था। धर्मेंद्र के जाने के बाद हेमा ने उसी पिंजरे में अपनी पूरी जिंदगी एक खामोश, तन्हा तपस्या की तरह गुजारी थी। आज इतिहास ने खुद को फिर उसी क्रूरता से दोहराया है—फर्क सिर्फ इतना है कि उस दौर में हेमा तन्हा थी, और आज सज्जनगढ़ की पथरीली जमीन पर सम्राट अपनी सुनैना के बिना अधूरा, बेबस और अकेला खड़ा है।

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