उदयपुर की भाग्यरेखा ‘देवास योजना’ के असली भगीरथ बने गुलाबचंद कटारिया : देवास थर्ड और फोर्थ के जमीनी निरीक्षण करने खुद टनल में उतरे कटारिया

 

उदयपुर। मेवाड़ के इतिहास में जब-जब उदयपुर की झीलों और यहां के जल संकट के स्थाई समाधान की बात होगी, तब-तब एक ही नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से याद किया जाएगा—गुलाबचंद कटारिया। करीब 60 साल पहले आधुनिक राजस्थान के निर्माता और पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मोहनलाल सुखाड़िया ने मेवाड़ की प्यास बुझाने के लिए जिस ‘देवास परियोजना’ का दूरदर्शी सपना देखा था, उसे अपने अडिग संकल्प और अथक प्रयासों से धरातल पर साकार करने का ऐतिहासिक काम पंजाब के राज्यपाल व चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाबचंद कटारिया ने किया है।

शनिवार को देवास थर्ड और फोर्थ के जमीनी निरीक्षण के दौरान जिस तरह कटारिया खुद टनल के भीतर उतरे, उसने यह साफ कर दिया कि इस परियोजना के प्रति उनका लगाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आत्मिक है। इस ऐतिहासिक समर्पण को देखते हुए अब प्रबुद्ध जनों और जनता के बीच से यह मांग पुरजोर तरीके से उठने लगी है कि इस पूरी योजना का नाम बदलकर ‘देवास-सुखाड़िया-कटारिया परियोजना’ किया जाना चाहिए।

जब टनल के भीतर उतरे मेवाड़ के भगीरथ

शनिवार को गोगुंदा के उण्डीथल में जब 10.5 किलोमीटर लंबी देवास थर्ड की टनल का काम देखने गुलाबचंद कटारिया पहुंचे, तो वे केवल बाहर से औपचारिकता निभाकर नहीं लौटे। एक कर्मठ जननायक की भांति वे स्वयं टनल के भीतर गए, चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई का तकनीकी मुआयना किया और सिंचाई विभाग व निर्माण कंपनी के इंजीनियरों से फीडबैक लिया। इसके बाद वे नाल गांव पहुंचे और देवास फोर्थ के बांध स्थल का भी गहन निरीक्षण किया।

इस अवसर पर शहर विधायक ताराचंद जैन, गोगुंदा विधायक प्रतापलाल गमेती सहित कई वरिष्ठ नेताओं और सिंचाई विभाग के अतिरिक्त मुख्य अभियंता वीरेंद्र सागर सहित आला अधिकारियों की मौजूदगी में कटारिया ने परियोजना की प्रगति पर विस्तार से विमर्श किया।

कटारिया के प्रयासों से ही मिली ‘संजीवनी’ : 22 जून को पर्यावरण क्लीरेंस

यह कटारिया की दिल्ली दरबार और केंद्रीय मंत्रालयों में मजबूत पकड़ का ही नतीजा है कि सालों से अटकी हुई वन एवं पर्यावरण विभाग की क्लीरेंस (मंजूरी) इस प्रोजेक्ट को मिल सकी। कटारिया ने खुद खुलासा किया कि हाल ही में कपूरथला में उन्होंने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात कर इस प्रोजेक्ट में आ रही बाधा का जिक्र किया था। कटारिया के आग्रह पर केंद्रीय मंत्री ने तत्परता दिखाई और महज कुछ घंटों के भीतर 22 जून को पर्यावरण विभाग की अंतिम मंजूरी जारी हो गई। क्लीरेंस मिलते ही ठप पड़े काम में जान आ गई है और अब हर महीने 700 मीटर टनल खुदाई का लक्ष्य रखा गया है।

2045 तक झीलें रहेंगी लबालब, बीसलपुर तक पहुंचेगा लाभ

₹1700 करोड़ के भारी-भरकम बजट वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर कटारिया ने उदयपुर के भविष्य का पूरा खाका देश के सामने रखा:

2028 में काम पूरा, 2029 से पानी: वर्ष 2028 तक देवास थर्ड और फोर्थ का काम शत-प्रतिशत पूरा हो जाएगा और 2029 से उदयपुर की झीलों को प्रचुर पानी मिलना शुरू हो जाएगा।

20 साल की निश्चिंतता: कटारिया के इस विजन के कारण वर्ष 2045 तक उदयपुर की झीलें कभी खाली नहीं रहेंगी।

विस्तृत जल तंत्र: यह पानी सिर्फ पिछोला या फतहसागर तक नहीं थमेगा, बल्कि उदयसागर, वल्लभनगर, बड़गांव, घोसुंडा बांध से होते हुए सीधे टोंक के बीसलपुर बांध तक जाएगा, जिससे आधा राजस्थान लाभान्वित होगा।

परियोजना का तकनीकी खाका (कुल 14.5 किमी लंबी टनल)

देवास थर्ड: नाथियाथल गांव के पास 703 एमसीएफटी क्षमता का बांध, जहां से 10.50 किमी लंबी सुरंग के जरिए पानी देवास द्वितीय (आकोदड़ा बांध) और फिर पिछोला झील पहुंचेगा।

देवास फोर्थ: अम्बा गांव के पास 390 एमसीएफटी क्षमता का बांध, जिसे 4.15 किमी लंबी सुरंग से देवास थर्ड से जोड़ा जाएगा।

सुखाड़िया का विजन, गहलोत का सहयोग और कटारिया का संकल्प

कटारिया ने अपनी राजनीतिक शुचिता का परिचय देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया का आभार जताया जिन्होंने 1965 में इस योजना की नींव रखी थी। साथ ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी याद किया, जिन्होंने अपने पिछले कार्यकाल के अंतिम दिनों में कटारिया की मांग पर इसके लिए बजट जारी किया था। कटारिया ने डूब क्षेत्र के किसानों को पर्याप्त मुआवजा दिलवाया और वन विभाग की जमीन के बदले सरिस्का (अलवर) में वैकल्पिक भूमि की व्यवस्था करवाकर सभी अड़चनों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

क्यों होनी चाहिए ‘देवास-सुखाड़िया-कटारिया परियोजना’ नामकरण की मांग?

उदयपुर के पर्यावरणविदों, बुद्धिजीवियों और आम जनता का मानना है कि मोहनलाल सुखाड़िया ने इस योजना की परिकल्पना की थी, लेकिन इसे अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाकर, बजट स्वीकृत करवाकर और हर तकनीकी व प्रशासनिक बाधा को पार कर मुकाम तक पहुंचाने का श्रेय केवल और केवल गुलाबचंद कटारिया को जाता है।

मेवाड़ को मरुस्थल बनने से रोकने और झीलों की नगरी की अस्मिता को अगले कई दशकों के लिए सुरक्षित करने वाले कटारिया के इस उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए सरकार को अविलंब इस योजना का नाम ‘देवास-सुखाड़िया-कटारिया परियोजना’ घोषित करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियां इस बात की गवाह रहेंगी कि सुखाड़िया के 60 साल पुराने सपने को यदि किसी ने भगीरथी रूप दिया, तो वह नाम गुलाबचंद कटारिया ही है।

 

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