मेवाड़ में 155 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन: कविराव परिवार की हवेली पर मोखाण पधारे डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़

बडलिया हवेली पर दिवंगत आत्मा को दी श्रद्धांजलि; रंग बदलाई दस्तूर में पहनाई पाग, प्रदान किए सरोपाव और पान बीड़ा

उदयपुर। मेवाड़ राजपरिवार और उनके प्रमुख सहयोगी घरानों के मध्य सदियों से चली आ रही आत्मीयता एवं सुख-दुःख में सहभागिता की समृद्ध परंपरा को मंगलवार को पुनः जीवंत किया गया। मेवाड़ के डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने उदयपुर स्थित बडलिया हवेली पधारकर प्राचीन मोखाण परंपरा का निर्वहन किया।

स्वर्गीय राव बख्तावर सिंह के प्रपौत्र राव गजेंद्र सिंह की धर्मपत्नी के निधनोपरांत आयोजित इस रस्म में डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने राव गजेंद्र सिंह एवं उनके सुपुत्र राव अक्षय सिंह को ढांढस बंधाया और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

रंग बदलाई दस्तूर और सरोपाव की रस्म

मेवाड़ की 155 वर्ष पुरानी इस परंपरा को निभाते हुए औपचारिक रस्में पूरी की गईं:

  • रंग की पाग दस्तूर: रंग बदलाई दस्तूर के तहत डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने राव नरेंद्र सिंह को रंग की पाग पहनाई। वहीं, शास्त्री जी ने राव गजेंद्र सिंह, राव महेंद्र सिंह और राव अक्षय सिंह को रंग की पाग पहनाई।

  • पान बीड़ा व सरोपाव: परंपरा के अनुसार राजपरिवार की ओर से राव परिवार के सदस्यों को सरोपाव प्रदान किए गए तथा पान बीड़ा भेंट कर पारंपरिक रस्म को पूर्ण किया गया।

ऐतिहासिक बहियों में दर्ज है 155 वर्षों का इतिहास

मेवाड़ के ऐतिहासिक दस्तावेजों और बहियों में कविराव परिवार की हवेली पर मेवाड़ के महाराणाओं के मोखाण पधारने का गौरवशाली उल्लेख मिलता है:

  • 13 जुलाई 1871: मेवाड़ के 71वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा शंभू सिंह, कवि राव बख्तावर सिंह की माताजी के देहावसान पर हवेली में मोखाण पधारे थे।

  • 22 अप्रैल 1894: 73वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा फतह सिंह, कवि राव बख्तावर सिंह के निधन के पश्चात उनके पुत्र गोविंद सिंह के यहां मोखाण पधारे।

  • वर्ष 1964: 75वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ ने कवि राव बख्तावर सिंह के सुपौत्र कवि राव मोहन सिंह के निधन पर हवेली पधारकर अपनी आत्मीयता प्रकट की थी।

  • वर्ष 2026: 77वें वंशधर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का मोखाण पधारना इस डेढ़ सदी पुरानी आत्मीय परंपरा की निरंतरता और सांस्कृतिक विरासत का परिचायक है।

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