तस्वीरों में दर्ज उदयपुर का इतिहास : कैमरे के उन जांबाजों को सलाम

फोटोग्राफी डे पर विशेष

किसी शहर का इतिहास केवल किताबों, दस्तावेजों और सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं होता। इतिहास उन तस्वीरों में भी सांस लेता है, जिन्हें किसी फोटो जर्नलिस्ट ने सही समय पर अपने कैमरे में कैद किया होता है। उदयपुर की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यात्रा को अगर तस्वीरों के आईने में देखा जाए तो कई ऐसे नाम सामने आते हैं, जिन्होंने अपने कैमरे को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी माना।

उदयपुर के फोटो पत्रकारिता जगत में स्वर्गीय जयकांत शर्मा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने शहर और समाज के अनेक महत्वपूर्ण पलों को अपने कैमरे में इस तरह कैद किया कि वे तस्वीरें महज फोटो नहीं रहीं, बल्कि उस दौर की गवाही बन गईं। उनका कैमरा शहर की धड़कन को महसूस करता था और घटनाओं के पीछे छिपी कहानी को सामने लाता था।

पत्रिका के प्रमोद सोनी ने भी उदयपुर की पत्रकारिता में फोटो के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। खबर कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे पाठक तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में तस्वीर की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। प्रमोद सोनी की तस्वीरों ने खबरों को चेहरा दिया और कई घटनाओं को लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रखा।

ऋषभ जैन ने दैनिक भास्कर में लंबे समय तक बेहतरीन न्यूज फोटोग्राफी करते हुए उदयपुर की पत्रकारिता को मजबूत दृश्य पहचान दी। राजनीतिक गतिविधियों से लेकर सामाजिक सरोकारों और घटनाओं-दुर्घटनाओं तक, उनके कैमरे ने शहर के बदलते दौर को करीब से दर्ज किया। कई बार जहां शब्द कम पड़ जाते हैं, वहां एक तस्वीर पूरी कहानी कह देती है—ऋषभ जैन की फोटोग्राफी ने इस बात को साबित किया।

कमल कुमावत उदयपुर के उन चर्चित फोटो जर्नलिस्टों में हैं, जिन्होंने शहर की तस्वीर को कैमरे की नजर से लगातार सामने रखा। सामाजिक आयोजनों से लेकर राजनीतिक हलचल और शहर की रोजमर्रा की जिंदगी तक, उनके कैमरे ने उदयपुर के अनेक रंगों को सहेजा है। उनकी तस्वीरों में केवल दृश्य नहीं, बल्कि उस दृश्य के पीछे की संवेदना भी दिखाई देती है।

दैनिक नवज्योति के कैलाश टांक ने भी फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई। खबर की तलाश में घटनास्थल तक पहुंचना, सही एंगल तलाशना और उस एक निर्णायक क्षण को कैमरे में कैद करना—यही फोटो जर्नलिस्ट की असली परीक्षा होती है। कैलाश टांक ने अपने काम के जरिए इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।

वरिष्ठ राजेंद्र हिलेरिया का योगदान भी उदयपुर की फोटो पत्रकारिता की यात्रा में उल्लेखनीय रहा है। पुराने दौर में सीमित संसाधनों के बीच फोटो पत्रकारिता करना आज के डिजिटल दौर से बिल्कुल अलग चुनौती थी। कैमरे, फिल्म, प्रकाश और तकनीकी सीमाओं के बावजूद महत्वपूर्ण घटनाओं को रिकॉर्ड करना एक कला भी थी और जुनून भी। ऐसे दौर के फोटो पत्रकारों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए दृश्य दस्तावेज तैयार किए।

वहीं रामा स्टूडियो के सुशील जी जैसे लोगों ने भी उदयपुर में फोटोग्राफी की परंपरा को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई। स्टूडियो फोटोग्राफी से लेकर सामाजिक जीवन की तस्वीरों तक, कैमरे के जरिए लोगों की यादों को संजोने का काम अपने आप में समाज की सेवा है। आज मोबाइल कैमरा और डिजिटल तकनीक के दौर में भले ही तस्वीर खींचना बेहद आसान हो गया हो, लेकिन उस दौर के फोटोग्राफरों की मेहनत, धैर्य और तकनीकी समझ को भूलाया नहीं जा सकता।

इन सभी नामों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इनके कैमरे ने केवल तस्वीरें नहीं खींचीं, बल्कि समय को रोककर रख दिया। उदयपुर में हुए सामाजिक आंदोलनों, राजनीतिक घटनाक्रमों, धार्मिक आयोजनों, उत्सवों, दुर्घटनाओं, मानवीय त्रासदियों और शहर की बदलती तस्वीर—इन सबका कोई न कोई दृश्य दस्तावेज इनके कैमरों ने तैयार किया।

घटना और दुर्घटना की तस्वीर लेना भी आसान काम नहीं होता। जहां आम आदमी भय, अफरातफरी या संवेदना में घिरा होता है, वहां फोटो जर्नलिस्ट कैमरा लेकर खड़ा होता है। कई बार उसे जोखिम उठाना पड़ता है, कई बार भावनाओं को नियंत्रित करना पड़ता है और कई बार ऐसी तस्वीर कैद करनी पड़ती है जिसे देखकर समाज को झकझोरना जरूरी होता है।

एक अच्छी न्यूज फोटो केवल यह नहीं बताती कि क्या हुआ, बल्कि यह भी बताती है कि उस घटना का असर क्या था। यही वजह है कि फोटो पत्रकारिता को पत्रकारिता की सबसे प्रभावशाली विधाओं में माना जाता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में हर हाथ में कैमरा है। हर घटना की सैकड़ों तस्वीरें और वीडियो कुछ ही सेकंड में सामने आ जाते हैं। लेकिन मोबाइल से तस्वीर खींचने और फोटो पत्रकारिता के बीच वही अंतर है जो किसी दृश्य को देखने और उसकी कहानी समझने के बीच होता है। एक प्रशिक्षित फोटो जर्नलिस्ट उस निर्णायक क्षण को पहचानता है, जब एक क्लिक पूरी घटना का दस्तावेज बन सकता है।

उदयपुर की फोटो पत्रकारिता के इन चेहरों ने इसी जिम्मेदारी को वर्षों तक निभाया। जयकांत शर्मा से लेकर प्रमोद सोनी, ऋषभ जैन, कमल कुमावत, कैलाश टांक, राजेंद्र हिलेरिया और रामा स्टूडियो के सुशील जी तक—इन नामों की तस्वीरों में उदयपुर का एक दौर दर्ज है।

इनके कैमरों ने कभी सत्ता के गलियारों को देखा, कभी आम आदमी की पीड़ा को, कभी शहर के उत्सवों को तो कभी हादसों की भयावहता को। कभी किसी आंदोलन की आवाज को तस्वीर दी तो कभी किसी अनजान चेहरे की कहानी को समाज तक पहुंचाया।

आज फोटोग्राफी डे के अवसर पर इन सभी फोटो जर्नलिस्टों और फोटोग्राफरों को सलाम करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उन्होंने हमें सिर्फ तस्वीरें नहीं दीं—उन्होंने हमें अपना अतीत देखने की आंखें दीं।

समय बीत जाता है, चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, घटनाएं पुरानी हो जाती हैं। लेकिन एक तस्वीर वहीं ठहर जाती है।

और जब वर्षों बाद कोई उस तस्वीर को देखता है तो इतिहास फिर से बोल उठता है—

“यह वही उदयपुर है… यह वही दौर है… और यह उस दौर को अपनी आंखों से देखने वाले कैमरे की गवाही है।”

फोटोग्राफी डे पर उदयपुर के उन सभी कैमरा योद्धाओं को नमन, जिन्होंने अपने लेंस से शहर की कहानी लिखी और आने वाली पीढ़ियों के लिए समय को तस्वीरों में सुरक्षित कर दिया।

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