उदयपुर की डायरी : जब शहर को बचाने के लिए खाकी और खादी एक मेज पर बैठे

आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार उदयपुर के साथ मेरी मोहब्बत पुरानी है। जब भी मैं इस शहर की झीलों, पुरानी हवेलियों और संकरी गलियों के बारे में सोचता हूं, तो मन किसी पुरानी स्कॉच की तरह महक उठता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में एक कड़वी हकीकत ने इस खूबसूरती पर धूल की एक मोटी परत चढ़ा दी थी—यहां का बेतरतीब और दमघोंटू ट्रैफिक। सैलानी दुनिया भर से सुकून की तलाश में झीलों की इस नगरी में आते हैं, और पता चलता है कि वे बापू बाजार या सूरजपोल के किसी चौराहे पर अपनी टैक्सी में तीन घंटे से हॉर्न का शोर झेल रहे हैं।

मगर मंगलवार को एक अच्छी और तरोताजा कर देने वाली खबर आई। जब सरकारी अफसर और राजनेता अक्सर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर चाय की चुस्कियां लेते हैं, उदयपुर में इसके उलट एक बेहद सकारात्मक और व्यावहारिक पहल देखने को मिली।

शहर के नए मेयर पारस सिंघवी और जिला पुलिस अधीक्षक अमृता दुहन एक साथ मेज पर बैठे। सिंघवी साहब ने कोई लाग-लपेट नहीं रखी, उन्होंने सीधे शहर की दुखती रग पर उंगली रखी और साफ शब्दों में कहा—”अगर इस शहर को बचाना है और इसकी साख कायम रखनी है, तो ट्रैफिक को हर हाल में सुधारना होगा।” एक जनप्रतिनिधि का अपनी ही व्यवस्था की खामियों को खुलकर स्वीकार करना और उसे सुधारने का संकल्प लेना, भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ और स्वागत योग्य दृश्य है।

उधर, पुलिस कप्तान अमृता दुहन का अंदाज भी तारीफ के काबिल था। वे किसी तानाशाह की तरह डंडा लेकर नहीं उतरीं। उन्होंने एक समझदार और सुलझे हुए प्रशासक की तरह कहा कि पहला कदम ‘समझाइश’ का होगा—व्यापारियों, संस्थाओं और आम नागरिकों को भरोसे में लिया जाएगा। हां, अगर कोई शहर की सांसों को रोकने पर ही आमादा रहेगा, तो फिर कानून सख्ती से अपना काम करेगा। यह रवैया दिल जीतने वाला है, सुधार बंदूक की नोक पर नहीं, भरोसे के साथ ही स्थायी होते हैं।

प्लान भी कागजी नहीं, बिल्कुल जमीनी और व्यावहारिक लगता है। जगदीश चौक और गणगौर घाट जैसे ऐतिहासिक इलाकों से अतिक्रमण हटेगा, रानी रोड का दम घुटने से बचाया जाएगा, और सूरजपोल व बापू बाजार में रास्तों को ठेलों के मकड़जाल से मुक्त किया जाएगा। सालों से शहर के कोनों में लावारिस खड़ी रहने वाली बसों पर भी शिकंजा कसेगा।

सबसे ज्यादा राहत की बात यह है कि गुलाब बाग पार्किंग का कानूनी पेच सुलझने के करीब है। जब 125 से ज्यादा बसें और 300 कारें मुख्य सड़कों के बजाय अपनी तय जगह पर पार्क होंगी, तो इस खूबसूरत शहर को खुलकर सांस लेने का मौका मिलेगा।

पर्यटन सीजन की दहलीज पर खड़ा उदयपुर अब सिर्फ तमाशबीन नहीं बना हुआ है। खाकी और निगम का यह साझा कदम उम्मीद जगाता है कि आने वाले दिनों में जब सैलानी पिछोला या फतहसागर का रुख करेंगे, तो उन्हें घंटों जाम की घुटन नहीं, बल्कि लेकसिटी की ताजी हवा और सुकून का अहसास मिलेगा। शहर की नब्ज सही हाथों में है, और जब नीयत साफ हो, तो रास्ते अपने आप चौड़े हो जाते हैं।

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