ले लो पार्षद का टिकट ले लो… हमसे लोगे तो सीधे मेयर बनोगे!

वार्ड का टिकट तो बहाना है, असली निशाना तो ‘महापौर की कुर्सी’ पाना है; उदयपुर नगर निगम चुनाव की सुगबुगाहट में हर दावेदार मांग रहा ‘मेयर-डिप्टी मेयर’ की गारंटी

उदयपुर। शहर की आबोहवा में इन दिनों चुनावी चौसर बिछ चुकी है और गली-मोहल्लों से लेकर सियासी ड्राइंग रूम्स तक बस एक ही हाक सुनाई दे रही है— “ले लो पार्षद का टिकट ले लो… हमारे खेमे से लोगे तो सीधे मेयर बनवाएंगे!”

उदयपुर नगर निगम चुनाव 2026 की डुगडुगी बजते ही दावेदारों की ऐसी फौज मैदान में उतर आई है, जिसमें सिपाही कोई नहीं बनना चाहता, सबको सीधे ‘सेनापति’ ही बनना है। स्थानीय स्तर के छुटभैया नेताओं की गणेश परिक्रमा से लेकर जयपुर और दिल्ली के सियासी आकाओं के फोन दिन-रात घनघना रहे हैं। मजे की बात यह है कि भागदौड़ में पसीना बहा रहे इन माननीयों को महज वार्ड पार्षद का टिकट नहीं चाहिए, बल्कि साथ में ‘मेयर पद की पक्की गारंटी’ भी चाहिए।

जनरल वाले को ‘मेयर’ और आरक्षित वाले को चाहिए ‘कुर्सी’ की गारंटी

सियासत का यह गजब तमाशा किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में गारंटी बांटने और मांगने की होड़ मची है:

  • अनारक्षित (जनरल) वार्डों की ख्वाहिश: जनरल वार्ड से ताल ठोक रहा हर दूसरा दावेदार खुद को भावी महापौर मानकर चल रहा है। फॉर्म भरने से पहले ही आकाओं से सौदेबाजी हो रही है कि “जीतने के बाद ताज हमारे सिर ही बंधेगा ना?”

  • आरक्षित वर्ग की शर्तें: जहां वार्ड आरक्षित हैं, वहां के दावेदार भी कम नहीं हैं। वे साफ कह रहे हैं— “मेयर नहीं तो कम से कम डिप्टी मेयर या फिर मलाईदार समितियों की अध्यक्षता की लिखित गारंटी दो, तभी पर्चा भरेंगे!”

  • टिकट दलालों की गारंटी की दुकान: इस बहती गंगा में टिकट दिलवाने का दावा करने वाले ‘रसूखदार पैरोकार’ भी पीछे नहीं हैं। वे भी चुनावी थोक भाव में गारंटी बांट रहे हैं कि “बस हमारे साथ रहो, टिकट भी पक्का और कुर्सी भी तय!”

युवा जोश बनाम ‘अनुभवी’ बुढ़ापा: दोनों तरफ से ताल

टिकट की इस नूराकुश्ती में पीढ़ियों का टकराव भी खुलकर सतह पर आ गया है:

  • युवा ब्रिगेड का तर्क: नौजवान दावेदार पार्टी आलाकमान को ‘युवा नेतृत्व और नया खून’ का पाठ पढ़ा रहे हैं कि अब बुजुर्गों को आराम करना चाहिए और युवाओं को शहर की कमान सौंपनी चाहिए।

  • वरिष्ठों की जिद: दूसरी तरफ पार्टी के पुराने धुरंधर और सीनियर नेता अपनी बरसों की ‘तपस्या और तजुर्बे’ की दुहाई देकर अड़े हैं कि निगम की गाड़ी अनुभव से चलती है, उत्साह से नहीं।

वार्ड की नालियां साफ हों न हों, स्ट्रीट लाइटें जलें न जलें, लेकिन टिकटार्थियों की हसरतों के बल्ब पूरी 100 वॉट की रोशनी के साथ जल रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे चुनती है और गारंटी बांटने वाले आका चुनाव बाद कितनों को पहचानते भी हैं!

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