सर्द हवाओं में पिघलते सुर : रेपरिया बालम और फकीरा खान के नगमों से महकी उदयपुर की शाम, आज पलक मुच्छल की आवाज़ पर झूमेगा शहर

उदयपुर। टाउन हॉल की सीढ़ियों पर जब शाम धीरे-धीरे उतर रही थी, तो हवा में सिर्फ त्योहार की खुशबू नहीं थी… सुरों का एक पूरा दरिया बह रहा था। नगर निगम उदयपुर के दीपावली मेला 2026 की दूसरी रात कुछ ऐसी बीती, जैसे किसी ने पुरानी मखमली यादों पर नई रोशनी की तान छेड़ दी हो।

दीयों की लौ जब कांपती है, तो जैसे अंधेरे से कोई वादा करती है। कुछ ऐसा ही वादा उस शाम भी हुआ, जब मां सरस्वती और विघ्नहर्ता गणेश की प्रतिमा के आगे दीप जलाकर इस महफ़िल का परदा उठाया गया। इस पाकीज़ा शुरुआत के गवाह बने नगर निगम महापौर पारस सिंघवी, पूर्व सांसद अर्जुन लाल मीणा, सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति कैलाश डागा, पूर्व डीजीपी मनोज भट्ट, पूर्व संभागीय आयुक्त राजेन्द्र भट्ट, समाजसेवी राहुल बड़ाला, राजस्थान पत्रिका के संपादक राजीव जैन, शैलेन्द्र चौहान, करण सिंह शक्तावत, दीपक वसीटा, कल्लाजी देव पीठ के हेमंत जोशी, प्रतापराय चुग, कर्मचारी नेता कमल बाबेल, माहेश्वरी समाज अध्यक्ष जमनेश धूपड़, नरेन्द्र पालीवाल, बार एसोसिएशन अध्यक्ष जितेन्द्र जैन, डॉ. शोभालाल औदिच्य, चिंतन लोढ़ा और अरुण मांडोत।

मेला संयोजक प्रमोद सामर की बात सच साबित हुई—यह शाम वाकई उन दीवानों के नाम थी जो सुरों में अपनी रूह तलाशते हैं।

रेपरिया बालम: माटी की सौंधी महक में नए दौर की सरगम

रायसिंहनगर (श्रीगंगानगर) की मिट्टी से निकले अशोक मंडा—जिन्हें दुनिया रेपरिया बालम के नाम से पुकारती है—जब मंच पर आए, तो लगा जैसे सदियों पुरानी लोक-परंपरा ने आधुनिक लिबास पहन लिया हो। उन्होंने जब ‘म्हारो राजस्थान’ की तान छेड़ी, तो सुनने वालों की रूह तक सिहर उठी।

फिर तो गीतों की एक कतार सी लग गई। ‘लाल पीली अखियां’, ‘बन्ना जी रॉबिन हुड’, ‘इलायची’, ‘काच केरी’ और ‘बन्ना थे जयपुरियो ते जायजो जी’… हर नगमे के साथ तालियों की गूंज और गहरी होती गई। जब उन्होंने महाराणा प्रताप की वीरता को समर्पित अपनी चर्चित ‘शूरवीर’ श्रृंखला का गीत गाया—वही गीत जिसका अक्स कभी मिर्ज़ापुर के पर्दे पर भी उभरा था—तो मेवाड़ के स्वाभिमान की गूंज से पूरा माहौल दमक उठा। यह सिर्फ गाना नहीं था, अपनी जड़ों को नई पीढ़ी की धड़कनों से जोड़ने का एक हुनरमंद जरिया था।

फकीरा खान और मांगणियार: रेत के टीलों से उठी सदियों की पुकार

और फिर बाड़मेर की तपती रेत से आई वो ठंडी, रूहानी हवा… फकीरा खान और उनके 30 फनकारों का मांगणियार कारवां। कमैचा और खड़ताल की संगत पर जब उन्होंने मां करणी का भजन छेड़ा, तो लगा जैसे भक्ति खुद ब खुद झुककर सलाम कर रही हो।

‘वारी जाऊं रे बलिहारी जाऊं रे’ और ‘केसरिया बालम आवो नि पधारो म्हारे देश’ से उन्होंने जब दिलों पर दस्तक दी, तो पूरा पंडाल मेवाड़ और मारवाड़ के संगम में डूब गया। फिर एक अजब सी शोखी घुली हवा में—‘आवो आवो मेरे कृष्ण कन्हैया’, ‘ठरकी छोकरा’ और ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है’ ने हर किसी को झूमने पर मजबूर कर दिया।

फकीरा खान का कहना भी कितना मौजूं था—कि हम अपने बच्चों को तालीम के साथ-साथ ये सुर, ये परंपरा इसलिए सिखाते हैं ताकि हमारी सदियों की विरासत किसी मोड़ पर सांस न खो दे। 100 से ज्यादा फनकारों का यह कुनबा आज भी उस मौखिक इतिहास को अपने सीने में संजोए गा रहा है, जो कभी राजाओं और व्यापारियों की चौखट से शुरू होकर आज दिलों की सल्तनत बन चुका है।

एक सुरीली आहट: आज पलक मुच्छल की आवाज़ से महकेगा शहर

निगम उपायुक्त एवं मेला अधिकारी हरि सिंह देवल ने बताया कि इस सुरीले सफर का अगला पड़ाव और भी हसीन होने वाला है। शुक्रवार की शाम देश की जानी-मानी गायिका पलक मुच्छल के नाम होगी। वही आवाज़, जिसने ‘आशिकी-2’ के ‘चाहूँ मैं या ना’ से दिलों को धड़कना सिखाया और ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ के ‘कौन तुझे यूं प्यार करेगा’ से आंखों में ख़्वाब भर दिए।

उदयपुर आज की रात फिर से सुरों की चादर ओढ़कर झूमने के लिए तैयार है।

 

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