एक डॉक्टर, दो दशक और एक विवाद जिसने भरोसा हिला दिया

 

उदयपुर के बड़गांव सेटेलाइट हॉस्पिटल की उस सुबह में अजीब-सी बेचैनी थी। लोग अपने नंबर की चिंता छोड़कर बस एक ही दरवाज़े की तरफ देख रहे थे—डॉ. अशोक शर्मा कब आएंगे? हवा में तनाव ऐसा था मानो पूरे अस्पताल पर कोई अदृश्य बादल मंडरा रहा हो।

और तभी सफेद कोट पहने डॉ. शर्मा अस्पताल में दाखिल हुए। उनके आते ही बरामदे में एक हलचल सी हुई, पर यह रोज़ की राहत वाली हलचल नहीं थी। आज चेहरों पर उम्मीद से ज्यादा दर्द था। किसी की आंखें लाल थीं, कोई अपने आंसू छुपाने की कोशिश कर रहा था, और कई लोग उन्हें देखते ही चुप हो गए—जैसे इस चुप्पी में ही सब कुछ कह दिया हो।

कारण सबको पता था—उन्हें जयपुर तलब कर लिया गया था।
वजह भी सबको मालूम थी—शिकायत।
पर शिकायत क्या थी?
किसने की थी?
जांच क्यों नहीं हुई?
इसका जवाब किसी के पास नहीं था।

भीड़ में खड़े कई लोग धीरे-धीरे फुसफुसा रहे थे—“ये वही लोग हैं जो राजनीति में अपनी पकड़ दिखाने के लिए हर उस चीज़ को निशाना बनाते हैं, जो सच में जनता के काम आती है।” गांव के कुछ लोग साफ कह रहे थे—“बीजेपी के दो-तीन स्थानीय लोग, जिन्हें अपने निजी स्वार्थ पूरे करने थे, उन्होंने जाकर शिकायत लिखवा दी। न कोई पूछताछ, न कोई सच्चाई—एकदम सीधे आदेश: डॉक्टर को हटा दो।”

यह बात मरीजों में गुस्सा और बढ़ा देती थी। एक बुजुर्ग किसान ने धीरे से कहा—“इन नेताओं को वोट के वक्त हम याद आते हैं, पर इलाज देने वाला असली आदमी अगर उन्हें खटकता है तो वे उसे हटवाने तक से नहीं चूकते।” कई लोगों ने यह भी कहा कि शिकायत करना कोई गलत बात नहीं, लेकिन बिना जांच किए किसी ईमानदार डॉक्टर पर कार्रवाई कर देना जनता के साथ धोखा है।

इसी बीच एक महिला डॉक्टर के कमरे में दाखिल हुईं। आंखों से आंसू बहते जा रहे थे। आप किसी का क्या बिगाड़ रहे थे? इलाज बांट रहा थे, दवा दे रहा थे… फिर भी आपको ही क्यों हटाया जा रहा है?” महिला के भीतर का दर्द सिर्फ डॉक्टर के लिए नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए भी था जिनके स्वार्थ के कारण पूरा क्षेत्र संकट में आ गया था।

डॉ. शर्मा ने शांत स्वर में उन्हें समझाया— आप चिंता मत करो। अभी मैं यहीं हूँ। अपना इलाज पूरा करवाओ।” पर यह शांत स्वर आज सामान्य नहीं था, उसमें एक दबी हुई पीड़ा थी।

कमरे के बाहर एक महिला अपने बच्चे को पकड़े बैठी थी। उसका गुस्सा किसी भी नेता या शिकायतकर्ता से छुप नहीं रहा था। “कोई पूछे उनसे, जिनके पास जाकर उन्होंने शिकायत की—क्या कभी उन्होंने इस डॉक्टर को कोरोना में काम करते देखा था? रात-रात भर लोगों को बचाने में लगे थे साहब। हम सब गवाह हैं। और जिन्हें इलाज करना था, उन्हें राजनीति करनी थी।”

भीड़ में कई लोग सिर हिलाते हुए उसकी बातों से सहमत हो रहे थे। किसी ने कहा—“शिकायत करने वाले लोग कभी अस्पताल में दिखाई दिए हैं क्या? सिर्फ नाम कमाने और दूसरों को डराने के लिए ऐसे कदम उठा लेते हैं।”

उधर डॉ. शर्मा शांत मुद्रा में बैठकर पर्चियाँ लिखते रहे, बच्चों की नाड़ी देखते रहे, बुजुर्गों के ब्लड प्रेशर चेक करते रहे—जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन कमरे की हवा भारी थी, और बाहर बैठा हर व्यक्ति जानता था कि उनके हाथों में वह डॉक्टर है जो शायद जल्द इस इलाके से चला जाए।

सरकार के कागज़ों में यह सिर्फ एक तबादला था, लेकिन लोगों की नजर में यह कुछ राजनीतिक लोगों की जल्दबाजी, गैर–जिम्मेदारी और व्यक्तिगत अहंकार का नतीजा था। शिकायत कितनी वास्तविक थी, इसका पता शायद कभी न चले। पर इतना सब जानते थे कि जिन्होंने शिकायत की, उन्होंने यह नहीं सोचा कि उन्होंने एक डॉक्टर नहीं, बल्कि पूरे इलाके की भरोसे की डोर काट दी है।

अस्पताल में आज दवाइयों से ज्यादा बात शिकायत करने वालों के फैसलों की हो रही थी, और हर मरीज के मन में एक ही सवाल गूंज रहा था—“क्या कुछ लोगों की राजनीति पूरे गांव का इलाज छीन सकती है?”

और इस सवाल का जवाब शायद उस अस्पताल की खामोशी में ही छिपा था, जो डॉ. शर्मा की उपस्थिति में भी आज टूट चुकी थी।

 

 

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