
उदयपुर। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजस्थान प्रदेश कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बनी डॉ. अलका मूंदड़ा ने मेवाड़ की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। डॉ. मूंदड़ा का यह पद हासिल करना पारंपरिक नेताओं के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है। उदयपुर में लंबे समय से राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखने वाले सियासी खिलाड़ी प्रमोद सामर जैसे खिलाड़ी इस अवसर में पिछड़ते दिख रहे हैं। साथ ही, मेवाड़ क्षेत्र में अपने समर्थकों के जरिए प्रभाव बनाए रखने वाले पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सी.पी. जोशी और पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के करीबी भी इस बार कार्यकारिणी में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सके।
विश्लेषक इसे भाजपा में शक्ति संतुलन और नए चेहरे को बढ़ावा देने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। डॉ. मूंदड़ा की छात्र राजनीति से लेकर महिला मोर्चा की जिला एवं प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियों तक का अनुभव उन्हें पार्टी में मजबूत पैठ बनाने में मदद कर रहा है। उनकी सियासी सक्रियता, जैसे महापौर पद के लिए प्रत्याशी आवेदन और महिला मोर्चा के विभिन्न पदों पर कार्यकाल, यह दर्शाता है कि उनका राजनीतिक उठाव केवल पदों तक सीमित नहीं बल्कि कार्यकुशलता पर आधारित है।
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया से निकट संबंध भी उनके राजनीतिक उदय का एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। यह गठजोड़ पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है, जिससे उदयपुर के पारंपरिक नेताओं को अपनी स्थिति मजबूत करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि डॉ. मूंदड़ा की यह पदोन्नति भाजपा में महिला नेताओं को बढ़ावा देने और पार्टी की युवा-नारी शक्ति को सशक्त बनाने की रणनीति का हिस्सा है। भविष्य में उनके उदयपुर और मेवाड़ क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव का विस्तार संभव है, जो आगामी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
डॉ. अलका मूंदड़ा का उपाध्यक्ष पद पर मनोनीत होना न केवल उनके व्यक्तिगत राजनीतिक सफर की सफलता है, बल्कि यह भाजपा में शक्ति संतुलन, युवा और महिला नेताओं के उदय, और पारंपरिक नेताओं के लिए चुनौती का प्रतीक भी है। उदयपुर की राजनीति में उनका प्रभाव अब और गहरा होने की संभावना है।
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