
सैयद हबीब, उदयपुर।
उदयपुर। उदयपुर नगर निगम चुनाव की सरगर्मियों के बीच कांग्रेस के कुछ अल्पसंख्यक नेताओं ने टिकट बंटवारे को लेकर बगावती तेवर दिखाए हैं। चेतक सर्कल पर जमा होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई, आंकड़े गिनाए गए, उपेक्षा के आरोप लगे और संगठन को खुली चेतावनी दी गई कि यदि अल्पसंख्यकों की अनदेखी जारी रही तो आगे परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन भारतीय राजनीति के इस जाने-पहचाने नाटक को यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए, तो यह विरोध कम और शुद्ध रूप से ‘दबाव की राजनीति’ (प्रेशर पॉलिटिक्स) ज्यादा नजर आता है।
सवाल यह नहीं है कि उदयपुर में अल्पसंख्यक आबादी 22 प्रतिशत है और टिकट केवल 4-5 फीसदी मिले। असली सवाल यह है कि जो नेता आज कैमरे के सामने खड़े होकर पार्टी से अपना ‘हक’ मांग रहे हैं, उन्होंने पिछले पांच बरसों में आम जनता या खुद अपने समुदाय के बुनियादी मुद्दों पर कितनी बार सीना तानकर संघर्ष किया? जब मुखर्जी चौक सब्जीमंडी से गरीब महिला रेहड़ी-पटरी वालों को उजाड़कर पार्किंग बनाई जा रही थी, तब कौम के ये स्वयंभू अलमबरदार कहाँ थे? अल्पसंख्यक महिला नेत्री नजमा मेवाफरोश के संघर्ष में इनमें से कौन उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा दिखा? अपने इलाकों के बदहाल सरकारी स्कूलों, चरमराती डिस्पेंसरियों और सीवरेज की सड़ांध पर इन नेताओं ने कभी कलेक्टर को महज एक औपचारिक ज्ञापन सौंपने के सिवा कोई बड़ा आंदोलन छेड़ा क्या?
राजनीति में हिस्सेदारी सिर्फ शिकायत करने या गिड़गिड़ाने से नहीं मिलती; उसके लिए जनाधार और दम-खम साबित करना पड़ता है। यदि इन विरोध दर्ज कराने वाले नेताओं में वाकई राजनीतिक माद्दा था, तो उन्हें उन कठिन वार्डों से ताल ठोकनी चाहिए थी जहां से कांग्रेस के बड़े-बड़े क्षत्रप चुनाव लड़ने से कन्नी काट रहे थे। वे भाजपा के कद्दावर नेताओं—पारस सिंघवी या प्रमोद सामर के सामने निर्दलीय या बागी बनकर ही मैदान में उतरते। जीतते न सही, कम से कम एक ऐतिहासिक टक्कर देकर अपनी सियासी हैसियत तो दिखाते!
दुनिया के फलक पर नजर दौड़ाइए। न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर जोहरान ममदानी की मिसाल हमारे सामने है। उन्होंने अपनी ही पार्टी के भीतर पहले गैर-मुस्लिम बहुल इलाकों में अपने प्रगतिशील विचारों, जनसरोकारों और जुझारूपन से जीत दर्ज की और फिर पूरे शहर की सियासी फिजा बदल दी। वहां घोर विरोधी माहौल था, फिर भी वे रोने नहीं बैठे बल्कि अपनी लकीर बड़ी की।
रियाज हुसैन, रईस खान और राशिद खान जैसे नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों की बदौलत ही कई जगह जमानत बचा पाती है और उन्हें 12 से 15 सीटें मिलनी चाहिए थीं। ताहिर खान और इजहार हुसैन पैराशूट उम्मीदवारों और भाजपा पृष्ठभूमि के लोगों को तरजीह दिए जाने पर खफा हैं। उनकी यह पीड़ा अपनी जगह सही हो सकती है कि संगठन में आंतरिक लोकतंत्र और स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हुई है।
परंतु सियासत का सीधा तकाजा है—अधिकार मांगे नहीं जाते, छीने जाते हैं। पार्टी ने रो-धोकर जो पांच टिकट दिए हैं, पहले उन पांचों सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंककर फतह हासिल कीजिए। जब उन पांचों वार्डों में परचम लहराएगा, तब सीना ठोककर आलाकमान के सामने बैठिए और कहिए कि यदि हमें दस सीटें और मिलतीं, तो हम निगम का नक्शा बदल देते। खाली विरोध और आंसुओं से कोई जंग नहीं जीती जाती।
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