भोजन न मिलने पर सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाते थे सुंदर सिंह भंडारी, पुण्यतिथि पर अमित शाह ने याद किया संघर्षमय जीवन

नई दिल्ली। जनसंघ के संस्थापक सदस्य और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक सुंदर सिंह भंडारी की पुण्यतिथि पर आज पूरा देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। इस अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनके जीवन के कड़े संघर्ष और सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को याद करते हुए भावुक संस्मरण साझा किए।

अमित शाह ने कहा कि आपातकाल (Emergency) के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए भंडारी जी का संघर्ष और विपरीत परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से समझौता न करने का उनका संकल्प आज भी हम सभी के लिए एक महान प्रेरणास्रोत है।

संगठन के ऐसे शिल्पकार जिन्होंने भाजपा का संविधान गढ़ा

गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा:

“जनसंघ के संस्थापक सदस्य, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक सुंदर सिंह भंडारी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। जनसंघ के प्रमुख स्तंभ सुंदर सिंह भंडारी ने भाजपा के संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे संगठन के एक ऐसे कुशल शिल्पकार थे, जिन्होंने व्यक्ति, समाज और संगठन की प्रतिभाओं को निखारने और गढ़ने का काम किया।”

अमित शाह ने सुनाई संस्मरण की अनसुनी कहानी: “पैर की पिंडलियां चौड़ी हो गई थीं”
अमित शाह ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें उन्होंने सुंदर सिंह भंडारी के गुजरात के राज्यपाल रहने के दौरान की एक व्यक्तिगत घटना का जिक्र किया। शाह ने बताया कि उस समय वे स्वयं विद्यार्थी परिषद और युवा मोर्चा के कार्यकर्ता के रूप में भंडारी जी के पास आते-जाते थे।

शाह ने बताया, “एक दिन मैंने भंडारी जी से सहज ही पूछ लिया कि आपके पैर को क्या हो गया है? पहले तो उन्होंने बात को हंसकर टाल दिया और कहा कि इस बात को किसी को नहीं बताना है।” शाह ने आगे बताया कि आज वह महान शख्सियत हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका वह वाक्य हम सबको भीतर तक झकझोर देता है और प्रेरणा देता है।

गांव-गांव घूमकर ऐसे किया संघ का विस्तार

भंडारी जी ने अमित शाह को बताया था कि जब वे राजस्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में कार्य कर रहे थे, तब उस दौर में संगठन की स्वीकार्यता बहुत कम थी और हर जगह भोजन मिलना संभव नहीं होता था।

थैले में सूखी रोटियां: संघ कार्यालय पर आने वाली रोटियों को वे कपड़ों की तरह सुखा लेते थे और फिर उन्हें कपड़े में लपेटकर, थैले में डालकर साइकिल से गांव-गांव घूमते थे।

पानी में भिगोकर खाते थे खाना: लगातार और लंबी दूरी तक साइकिल चलाने के कारण उनके पैर की पिंडलियां चौड़ी हो गई थीं। जब रास्ते में कहीं भोजन नहीं मिलता था, तो वे उसी सूखी रोटी को पानी में भिगोकर खाते थे और पुनः संघ कार्य के लिए आगे बढ़ जाते थे।

गृह मंत्री ने भावुक होते हुए कहा कि भंडारी जी ने इस प्रकार के तपस्वी और अनुशासित जीवन से संगठन को सींचा और आगे बढ़ाया। शाह ने कहा, “आज भी जब मैं उनके उस वाक्य को याद करता हूं, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।”

 

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