
उदयपुर। गोगुन्दा कस्बे की रात हमेशा की तरह शांत थी। 4 सितम्बर की उस काली रात में लोग अपने-अपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे। लेकिन कस्बे के बीचोंबीच स्थित एक किराना व मोबाइल दुकान पर चोरों की निगाहें टिकी हुई थीं।
अंधेरे में चार परछाइयाँ धीरे-धीरे दुकान की छत पर चढ़ीं। लोहे का गेट तोड़ा गया, फिर दीवार में सेंध मारी गई। अंदर रखे नोट, सोने-चांदी के गहने और 30 मोबाइल एक-एक करके थैलों में भर लिए गए। कुछ ही मिनटों में दुकान का सन्नाटा टूटा और चारों परछाइयाँ रात के अंधेरे में गुम हो गईं।
सुबह जब दुकान मालिक लोकेश सुराणा ने टूटी दीवार और बिखरे सामान को देखा, तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई। 15 हजार नगद, जेवर और मोबाइल—सब गायब। मामला सीधा-सीधा एक बड़ी चोरी का था। रिपोर्ट दर्ज हुई और गोगुन्दा पुलिस हरकत में आ गई।
जिला पुलिस अधीक्षक योगेश गोयल ने आदेश दिए—“चोरी करने वाले चाहे कितने ही चालाक हों, बच नहीं पाएंगे।”
थाना प्रभारी श्याम सिंह और उनकी टीम ने इलाके की खाक छानी। गुप्त सूत्रों, तकनीकी निगरानी और लगातार पीछा करने के बाद शक की सुई चार युवकों पर जाकर रुकी।
टीम ने एक-एक कर संदिग्धों को उठाया। पहले तो सबने बचने की कोशिश की, लेकिन कड़ी पूछताछ के बाद राज़ खुल गया।
चारों आरोपी—मुकेश, किशनलाल, इन्द्रलाल और भग्गालाल—ने कबूल किया कि यह सब उन्होंने “शौक और मौज-मस्ती” के लिए किया।
सिर्फ थोड़ी मौज उड़ाने के लिए उन्होंने पूरी दुकान उजाड़ दी थी। पुलिस ने उनसे चोरी का पूरा माल बरामद कर लिया।
चारों अब पुलिस हिरासत में हैं। गोगुन्दा की इस घटना ने कस्बे को हिला दिया, लेकिन साथ ही यह भी साबित किया कि अपराध कितना भी संगठित क्यों न हो, पुलिस की पैनी नज़र से बचना मुश्किल है।
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