झीलों की नगरी में फिर सजा ‘पर्यटन सुरक्षा’ का तमाशा : फीते कटने से नहीं, जवाबदेही तय होने से सुरक्षित होते हैं सैलानी

उदयपुर। हमारे देश की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था का सबसे प्रिय शगल क्या है? जवाब बहुत सीधा है—पुराने ढांचों की विफलता पर पर्दा डालकर नए तामझाम का फीता काटना। उदयपुर की विश्वप्रसिद्ध फतहसागर झील की पाल पर जब जिला पुलिस अधीक्षक डॉ. अमृता दुहन ने एक और नए ‘आधुनिक पर्यटक बूथ’ का उद्घाटन किया, तो कैमरों की चमक और अफसरों की मुस्कुराहटों के पीछे वही पुराना और थका हुआ प्रशासनिक नाटक फिर से मंचित होता दिखाई दिया।

दावा किया गया है कि इस बूथ पर अनुभवी पुलिसकर्मी चौबीसों घंटे तैनात रहेंगे, सैलानियों को दर्शनीय स्थलों का रास्ता बताएंगे और उनकी हर परेशानी का मौके पर ही निपटारा कर देंगे। पुलिस के इस नए उपक्रम के साथ ही शहर में ऐसे बूथों की संख्या बढ़कर अब सात हो गई है—सहेलियों की बाड़ी, मोती मगरी, सुखाड़िया सर्कल, गुलाब बाग, दूधतलाई और रानी रोड के बाद अब फतहसागर की मुख्य पाल। साथ में 24 पेट्रोलिंग टीमों के शहर भर में गश्त करने का रुटीन सरकारी आंकड़ा भी नत्थी कर दिया गया है।

मगर सवाल यह है कि इस नई नवेली तस्वीर पर तालियां पीटने से पहले क्या किसी ने पीछे मुड़कर देखने की जहमत उठाई? उदयपुर का इतिहास गवाह है कि पर्यटन के नाम पर ऐसे बूथ पहले भी बड़े गाजे-बाजे के साथ खोले गए थे, लेकिन वक्त की धूल चढ़ते ही वे पुलिसिया उदासीनता के चलते वीरान होकर बंद हो गए। जहां पुलिस की चौकसी होनी चाहिए थी, वे बूथ लावारिस डिब्बे बनकर रह गए। आलम यह है कि शहर के पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की सुविधा के लिए जो बीट अधिकारियों के नंबरों वाले बोर्ड टंगे हैं, उन पर वर्षों पुराने अफसरों के नंबर दर्ज हैं। बीट कांस्टेबल और दारोगा बदल जाते हैं, उनका तबादला हो जाता है, मगर पुलिस महकमे के पास इतना वक्त नहीं होता कि बोर्ड पर सफेदी पोतकर नया नंबर ही लिख दे। जिस महकमे से एक अदद फोन नंबर अपडेट नहीं होता, वह चौबीसों घंटे सैलानियों की सुरक्षा का दम भर रहा है।

खैर, रवायत के मुताबिक आज सातवें बूथ का उद्घाटन भी बड़े तामझाम से संपन्न हो गया। एएसपी से लेकर डीएसपी स्तर के आला अफसर कतारबद्ध खड़े नजर आए। लेकिन कायदे से एसपी महोदया डॉ. अमृता दुहन को इस नए बूथ का फीता काटने से पहले शहर और देश के सामने पिछले छह बूथों का रिपोर्ट कार्ड पेश करना चाहिए था। उन्हें जनता को बताना चाहिए था कि अब तक चल रहे उन छह बूथों ने कितने सैलानियों की जेब कटने से बचाई? कितने पर्यटकों को लपकों के चंगुल से छुड़ाया? और उन केंद्रों से सैलानियों को आखिरकार क्या ठोस लाभ मिला?

जब तक सिस्टम अपनी पुरानी नाकामियों का हिसाब नहीं देगा और केवल उद्घाटन के प्रचार में व्यस्त रहेगा, तब तक फतहसागर की पाल पर खुला यह बूथ भी महज एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगा। कागजों पर सुरक्षा के किले बनाना आसान है, लेकिन जमीन पर व्यवस्था चलाना जवाबदेही मांगता है—और हमारी पुलिस व्यवस्था इसी एक शब्द से सबसे ज्यादा कतराती है।

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