आभार यात्रा में आपने विंटेज कार देखी या नगर निगम के कोने का वो सन्नाटा देखा

फोटो : कमल कुमावत     उदयपुर। जब लोकतंत्र के चुनावी अखाड़े में शह और

फोटो : कमल कुमावत

 

उदयपुर। जब लोकतंत्र के चुनावी अखाड़े में शह और मात का खेल खत्म हो जाता है, तो उसके बाद शुरू होता है सत्ता का दृश्य-उत्सव। वह उत्सव, जिसे राजनीतिक दल ‘आभार यात्रा’ कहते हैं। उदयपुर की सड़कों पर आज वही उत्सव था। ढोल-नगाड़ों की थाप थी, डीजे पर बजते कर्णप्रिय और कभी-कभी कानफोड़ू संगीत की धुनें थीं, और सबसे आगे चल रही थी एक विंटेज कार।विंटेज कार—यानी अतीत की रईसी और वैभव का एक चमकता हुआ पहिया। उस खुली गाड़ी में सवार थे शहर के नए हुक्मरान: मेयर पारस सिंघवी और डिप्टी मेयर दिनेश भट्ट। साथ में सांसद मन्नालाल रावत, ज़िलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ और पूर्व सभापति रवींद्र श्रीमाली भी उसी फ्रेम में हाथ हिलाते हुए जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। पीछे-पीछे खुली गाड़ियों में जीते हुए पार्षदों का कारवां था। सूरजपोल से शुरू होकर धानमंडी, बापू बाज़ार और देहलीगेट की तंग गलियों से गुज़रती हुई यह यात्रा सत्ता के मुकम्मल होने का ऐलान कर रही थी।मगर, जैसा कि हम हमेशा कहते हैं—राजनीति को सिर्फ़ उस फ्रेम से मत देखिए जो कैमरे के सामने मुस्कुरा रहा है। राजनीति को उस खाली जगह से देखिए जो फ्रेम के बाहर छूट गई है।इस पूरी आभार यात्रा में एक बहुत बड़ा सन्नाटा था। और उस सन्नाटे का नाम था—प्रमोद सामर।भाजपा के वरिष्ठ नेता, खुद जीतकर आए पार्षद, मगर इस पूरे जलसे से नदारद। जब विंटेज कार शहर की सड़कों पर जनता का आभार बटोरने निकल चुकी थी, तब प्रमोद सामर नगर निगम के परिसर में कुछ गिने-चुने समर्थकों के बीच खड़े धीमी आवाज़ में बतिया रहे थे। आधिकारिक तर्क यह दिया गया कि वे किसी दूसरे ज़रूरी कार्यक्रम में व्यस्त थे, इसलिए समय पर शामिल नहीं हो पाए।लेकिन क्या भारतीय राजनीति में किसी नेता की ‘व्यस्तता’ सिर्फ़ व्यस्तता होती है? या फिर वह किसी बंद कमरे में हुई अनदेखी का खुला विरोध होती है? शहर की गलियों में चर्चा इस बात की कम थी कि विंटेज कार में कौन-कौन बैठा था, चर्चा इस बात की ज़्यादा थी कि प्रमोद सामर उस गाड़ी के आस-पास भी क्यों नहीं फटके।और सिर्फ़ सामर ही नहीं। खबर है कि मुख्य पार्षद अतुल चंडालिया, आकाश वागरेचा और महेंद्र सिंह शेखावत भी यात्रा के बीच रास्ते से ही धीरे से खिसक लिए। हालांकि, पिछले तीस सालों की सियासत के गवाह रहे पुराने चेहरे—युधिष्ठिर कुमावत, रवींद्र श्रीमाली और रजनी डांगी—मौजूद रहे, मानो यह संदेश देने के लिए कि पार्टी की पुरानी इमारत आज भी खड़ी है। जतिन श्रीमाली जैसे युवा पार्षद अंत तक डटे रहे।तो सवाल यह उठता है कि क्या यह आभार यात्रा पूरे संगठन का साझा उत्सव थी, या फिर यह महज़ जीते हुए उन चेहरों की नुमाइश थी जो सत्ता के नए समीकरणों में फिट बैठ गए हैं? जब एक वरिष्ठ नेता आभार जताने वाली विंटेज कार की धूल से भी दूर खड़ा रह जाए, तो समझ लेना चाहिए कि चुनाव भले ही जीत लिए गए हों, मगर असंतोष की पुरानी फाइलें अभी बंद नहीं हुई हैं। वे फाइलें अब भी किसी दराज़ में खुली पड़ी हैं, और राजनीति में जब ऐसी फाइलें खुलती हैं, तो उनका हिसाब आभार रैलियों से नहीं होता।आप तय कीजिए कि आपको विंटेज कार की चमक देखनी है, या निगम परिसर के कोने में खड़े उस सन्नाटे को पढ़ना है।शुभ रात्रि।

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