
कोई दीवाना कहता है, कोई मस्ताना समझता है,
मगर कुर्सी की बेचैनी को बस कुर्सी समझती है!
तड़पते ख्वाब को आख़िर मुकम्मल आसमां मिल ही गया,
मगर पारस की बेचैनी को इसी कुर्सी ने समझा है,
जिसे बरसों की तपस्या के बाद आज पारस ने संभाला है!
आदरणीय अग्रज, ऊर्जावान साथियों और इस ऐतिहासिक झीलों की नगरी के प्यारे बाशिंदों—
आज जब नगर निगम के टाउनहॉल में पारस सिंघवी ने उस सर्वोच्च आसंदी पर कदम रखा, तो वह दृश्य केवल एक राजनेता का किसी दफ़्तर में जाकर कुर्सी संभाल लेना भर नहीं था। वह उस निष्ठा की पूर्णाहुति थी, जो दशकों पहले ज़मीन की धूल फांकते हुए एक आम कार्यकर्ता के रूप में शुरू हुई थी। राजनीति के मंच पर अक्सर लोग कुर्सी मिलते ही अपनी जड़ों को भूल जाते हैं, उस ज़मीन को बिसरा देते हैं जहां से चलकर आए थे।
मगर आज जब पारस ने महापौर की उस गरिमामयी कुर्सी को संभाला, तो उनके भीतर का अहंकार नहीं, उनका समर्पण बोला। उन्होंने झुककर प्रणाम किया और कहा—भाजपा मेरी मां है और संघ संस्कार बनकर मेरी रगों में लहू की तरह बहता है!

वे मुस्कुराए और एक बहुत गहरी बात कह गए—कि यह कुर्सी कोई ऐश-ओ-आराम का सिंहासन नहीं है, यह तो उदयपुर की जनता का वो पावन कर्ज़ है जिसे मुझे अपनी अंतिम सांस तक, बिना थके, बिना रुके चुकाना है।
अरे, पदभार तो बहुत से लोग संभालते हैं, मगर पद को संभालते ही अपनी भूलों को स्वीकार कर लेने का हौसला केवल एक सच्चा साधक ही दिखा सकता है! पारस भाई ने बड़ी विनम्रता से कहा कि कुर्सी पर बैठकर केवल बड़े-बड़े भवनों और चौड़े राजमार्गों के सपने देखना ही विकास नहीं है। असली विकास तब है जब उस आखिरी गली की नाली भी साफ़ हो, जब रात के अंधेरे में सड़क का अंतिम खंभा भी रोशनी से जगमगाए, जब रेहड़ी-पटरी वाले छोटे व्यापारी का स्वाभिमान भी बचे और शहर का अनुशासन भी न टूटे।
और कितना सुंदर भाव था जब उन्होंने कहा कि परिसीमन के बाद जो नए इलाके नगर निगम की चौखट में आए हैं, वे कोई पराए नहीं हैं, वे तो हमारे छोटे भाई हैं! बड़े भाई का पहला धर्म होता है कि थाली का पहला कौर छोटे भाई के हिस्से में रखे।
तो भइया, आज उदयपुर के टाउनहॉल की इस कुर्सी को केवल एक महापौर नहीं मिला है, बल्कि इस पद को एक ऐसा जनसेवक मिला है जो शून्य से चलकर आया है और जिसने संकल्प लिया है कि जब तक सांस चलेगी, झीलों की नगरी के सम्मान और स्वाभिमान पर कोई आंच नहीं आने देगा।
कुर्सियां तो इतिहास में बहुतों को मिलीं और छिन गईं, मगर अमर वही हुए जिन्होंने कुर्सी पर बैठकर सत्ता का नहीं, जनता के दिलों का राज संभाला!
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