
उदयपुर। दुनिया में अपनी खूबसूरती और मेहमान नवाजी के मशहूर शहर को किसी की नजर लग गई है। पिछले दिनों सहपाठी के चाकूवार से घायल दसवीं कक्षा के छात्र देवराज के निधन ने सभी को सदमा पहुंचाया है। इस तरह की घटनाओं ने शहर को शर्मसार किया है। एक दूसरे के प्रति विश्वास को कमजोर किया है। पहले ये शहर ऐसा नहीं था। प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के सभी कदम उठाए हैं। स्कूलों कॉलेजों में मंगलवार की भी छुट्टी कर दी गई है। सभी जगह पर पुलिस बल तैनात है।
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गीतकार, शायर जावेद अख्तर की यह गजल आज इस उदयपुर के लिए पढ़नी चाहिए।
आज के परिपेक्ष्य में हमने इसको थोड़ा एडिट किया है।
ये शहर ऐसा नहीं था, जिसको हमने देखा था
इसमें अब वो बात नहीं, जो कभी सुकून का सपना था
वो मोहल्ले वो गलियां, जिनमें बच्चों के चहचहाटें गूंजती थी
अब कहीं गुम हो गई है, वो ममता की गर्मी और जिंदादिली की पूरी
दिवारें भी कहती थीं कुछ, जो अब बेजान सी हैं
किसी ने सुनी नहीं, उन यादों की धड़कनें अब शांत सी हैं
गुलाबबाग में खेलते थे बच्चे, जिनकी चहचहाहटें गूंजती थीं
अब सन्नाटा और खामोशी की चादर, हर कोने में पसरी है
हर त्योहार की यादें जो छुपी थीं, सभी मोहल्लों में
अब सिर्फ धुंधली तस्वीरें हैं, जो सड़कों पर रेखांकित हैं
ये शहर ऐसा नहीं था, जिसमें खुशियों की बारात थी
अब हर कोना और हर दीवार, बस एक खाली सा ख्वाब है
यहां गिले शिकवे भी रहते थे, तल्खियां भी थी
मगर ऐसा नहीं था, जो आज की खामोशी है
नोक-झोंक की आवाजें, गुस्से की गर्म लहरें
अब सिर्फ यादें हैं, जिनमें बस सन्नाटा बिखरा है
हमारे बीच की बातों में, छुपी थीं कुछ गहरी बातें
जो कभी दिल से जुड़ी थीं, अब सिर्फ पुरानी यादें बन गई हैं
दीवारें भी गवाह थीं, उन कहासुनी के लम्हों की
जो अब सिर्फ धुंधली तस्वीरों में सिमट गई हैं
यहां रिश्तों की जद्दोजहद, कुछ हंसी-खुशी का आदान-प्रदान
अब उन गुम हो चुकी लम्हों में, सिर्फ अजनबी सा बयां है
फिर भी हम यही बैठे हैं, उम्मीदों के सहारे
कि एक दिन इस घर में, लौटेगी वही हँसी और मयूरों की नज़ारे।
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