
तेहरान से इस्फ़हान तक हाहाकार : बमबारी का नया दौर, क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट है?
मिडल ईस्ट अब उस विनाशकारी मोड़ पर है जहाँ से वापसी नामुमकिन लग रही है। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के दिल ‘तेहरान’ समेत कई शहरों को निशाना बनाया है, तो वहीं ईरान ने भी होर्मुज़ की घेराबंदी कर दुनिया की नस दबा दी है।
अमेरिकी और इज़राइली वायु सेना ने ईरान के रणनीतिक केंद्रों—तेहरान, हमदान और इस्फ़हान पर भारी बमबारी की है। युद्ध केवल सीमा तक सीमित नहीं रहा; इज़राइल के अंदरूनी शहरों में भी तबाही के निशान हैं। डोनाल्ड ट्रंप का रुख स्पष्ट है—वाशिंगटन बात कर रहा है, लेकिन अगर तेहरान ‘डील’ की भाषा नहीं समझता, तो हमला रुकेगा नहीं।
ट्रंप का ‘अल्टीमेटम’: “हमारी फौज, तुम्हारा तेल… अब ऐसा नहीं चलेगा”
राष्ट्रपति ट्रंप ने एयरफोर्स वन से नाटो (NATO) सहयोगियों पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने मांग की है कि सहयोगी देश होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने के लिए अपने युद्धपोत भेजें। ट्रंप का तर्क आक्रामक है:
“यह तुम्हारा इलाका है, तुम्हारी ऊर्जा है। हमारे पास बहुत तेल है, हमें यहां रहने की ज़रूरत ही नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यूक्रेन में मदद लेने वाले देश अब हमारा साथ देते हैं या नहीं।”
खाड़ी देशों पर ड्रोन का साया : दुबई और कुवैत निशाने पर
युद्ध की आग अब पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैल चुकी है। दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ईंधन टैंकों पर ड्रोन हमला हुआ, जिसने दुनिया के सबसे व्यस्त हवाई मार्ग को हिलाकर रख दिया। कुवैत, कतर और सऊदी अरब के आसमान में भी दर्जनों ड्रोन मार गिराए गए हैं। हालांकि ईरान इन हमलों से इनकार कर रहा है, लेकिन पूरा खाड़ी क्षेत्र (GCC) अब ईरानी आक्रामकता के खिलाफ एकजुट खड़ा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता ‘एनर्जी ब्लैकआउट’
दुनिया की 20% तेल आपूर्ति का रास्ता ‘होर्मुज़’ अब एक युद्ध का मैदान है। Exxon और Chevron जैसी कंपनियों के प्रमुखों ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट अभी तो बस शुरू हुआ है। अगर यह रास्ता बंद रहा, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूएँगी, जिससे दुनिया भर में महंगाई का विस्फोट हो सकता है।
ईरान का ‘इंटरनल क्रैकडाउन’ : जासूसी के नाम पर गिरफ्तारियां
अंदरूनी मोर्चे पर ईरान की सरकार बेहद सख्त हो गई है। इज़राइल से संबंध होने के शक में 18 पत्रकारों और 500 से अधिक नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। युद्ध के बीच मानवाधिकारों का गला घोंटा जा रहा है, और बचाव कार्यों में लगे ‘रेड क्रिसेंट’ के कर्मी भी इस हिंसा की बलि चढ़ रहे हैं।
क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट है?
सिर्फ सैन्य ही नहीं, बल्कि डिप्लोमैटिक वॉर भी चरम पर है। ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों ने युद्धपोत भेजने से इनकार कर ट्रंप की रणनीति को झटका दिया है। यह युद्ध अब केवल दो देशों के बीच नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था के बिखरने और एक नए, अधिक हिंसक दौर की शुरुआत का संकेत है।
स्रोत : अल जजीरा
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