उदयपुर। देश में ऋतु परिवर्तन के साथ ही भीषण गर्मी का दौर शुरू हो चुका है। भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में विशेष महत्व रखने वाला “नौतपा” वर्ष 2026 में 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहेगा। इस दौरान पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी को देखते हुए राजकीय आदर्श आयुर्वेद औषधालय (सिंधी बाजार, उदयपुर) के वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. शोभालाल औदीच्य ने आमजन के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी विशेष सलाह जारी की है।
उन्होंने बताया कि सजगता, संतुलित आहार और सही दिनचर्या अपनाकर इस भीषण गर्मी में भी स्वस्थ और ऊर्जावान रहा जा सकता है।
क्या है नौतपा? जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
धार्मिक व ज्योतिषीय मान्यता: ‘नौतपा’ शब्द का अर्थ है नौ दिनों की तपन। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब पृथ्वी पर अत्यधिक गर्मी पड़ती है। ग्रामीण अंचलों में यह मान्यता है कि नौतपा में जितनी अच्छी तपन होगी, मानसून उतना ही बेहतर आएगा और वर्षा अच्छी होगी।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: वैज्ञानिक नजरिए से इस अवधि में सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे तापमान में भारी बढ़ोतरी होती है। यह तीव्र गर्मी वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) को प्रभावित करती है, जो मानसून के निर्माण में सहायक होती है।
अत्यधिक गर्मी से शरीर पर असर (आयुर्वेद के अनुसार)
डॉ. औदीच्य के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु और खासकर नौतपा के दिनों में शरीर में ‘पित्त दोष’ बढ़ने लगता है। इस कारण शरीर में पानी की कमी (Dehydration), थकान, सिरदर्द, चक्कर आना, अत्यधिक पसीना आना, घमौरियां (त्वचा रोग) और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। इस मौसम में लू (Heat Stroke) लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, जिससे बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग जल्दी प्रभावित होते हैं।
नौतपा से बचाव के लिए आयुर्वेद के ‘गोल्डन रूल्स’
डॉ. शोभालाल औदीच्य ने भीषण गर्मी से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए हैं:
प्राकृतिक पेय पदार्थों का सेवन: शरीर में पानी और खनिजों की कमी न होने दें। सादे पानी के अलावा बेल का शरबत, छाछ, सत्तू, नारियल पानी, नींबू पानी और कच्चे आम का पना (कैरी का पना) पिएं। ये शरीर को अंदर से ठंडा रखते हैं।
हल्का और सुपाच्य भोजन: अपने भोजन में खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूजा जैसे पानी से भरपूर मौसमी फलों को शामिल करें। अधिक तैलीय (Oily), मसालेदार और भारी भोजन से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि यह शरीर में पित्त और गर्मी को बढ़ाता है।
दिनचर्या में बदलाव: दोपहर की तेज धूप में अनावश्यक रूप से घर से बाहर निकलने से बचें। यदि बाहर जाना बहुत जरूरी हो, तो सिर को सूती कपड़े या टोपी से ढकें, सनग्लासेस पहनें और पानी की बोतल हमेशा साथ रखें।
विशेष संदेश: डॉ. औदीच्य ने कहा कि आधुनिक युग में लोग कृत्रिम साधनों (AC/Cooler) पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं, लेकिन आयुर्वेद हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना सिखाता है। प्रकृति के नियमों के अनुरूप खान-पान रखकर ही हम इस भीषण तपन में खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।
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