
उदयपुर। कहते हैं कि बीमारी सिर्फ शरीर को नहीं तोड़ती, वह एक हंसते-खेलते परिवार की हिम्मत और सपनों को भी तोड़ देती है। विशेषकर हमारे उन ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में, जहां जानकारी के अभाव में ‘कैंसर’ का नाम ही किसी अंधेरे डर जैसा महसूस होता है।
इसी अंधेरे को मिटाने और उम्मीद की नई लौ जलाने के लिए हिंदुस्तान जिंक और ममता संस्था ने हाथ मिलाया। विश्व कैंसर दिवस के मौके पर राजस्थान की पथरीली ज़मीनों से लेकर उत्तराखंड की वादियों तक एक अनूठा संकल्प गूँजा।
अपनों के लिए, अपनों के बीच
उदयपुर के जावर की पहाड़ियां हों, राजसमंद का दरीबा हो, या पंतनगर की शांत फिज़ाएं—मोबाइल हेल्थ वैन सिर्फ एक गाड़ी बनकर नहीं, बल्कि एक रक्षक बनकर पहुंची। इस अभियान का उद्देश्य केवल जाँच करना नहीं था, बल्कि उन माताओं, बहनों और बुजुर्गों को यह भरोसा दिलाना था कि “कैंसर का मतलब जीवन का अंत नहीं है।”
एक मां की मुस्कान : ग्रामीण महिलाओं को जब ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर के बारे में उनकी अपनी भाषा में समझाया गया, तो उनके चेहरों पर झिझक की जगह समझदारी और सुरक्षा का भाव दिखा।
नशे से जीवन की ओर : तंबाकू की गिरफ्त में फंसे कई युवाओं और पुरुषों ने जब कैंसर की भयावहता को करीब से समझा, तो उनकी आंखों में अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी और नशे को छोड़ने का एक सच्चा संकल्प नज़र आया।
सेवा का भाव, स्वस्थ कल का संकल्प
सत्रों के दौरान जब डॉक्टर और नर्सों ने स्थानीय बोली में बात की, तो दूर-दराज से आए ग्रामीणों के मन से डर की दीवारें ढह गईं। बीएमआई और ब्लड प्रेशर की जाँच के साथ-साथ जब उन्हें सही रास्ता दिखाया गया, तो लगा जैसे स्वास्थ्य की सेवा साक्षात उन तक पहुंच गई है।
“जब जानकारी का प्रकाश पहुँचता है, तो डर का अंधेरा अपने आप छंट जाता है।”
यह सिर्फ एक ‘इवेंट’ नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों को बचाने की एक कोशिश थी जो इलाज की देरी के कारण बिखर सकते थे। इस पहल ने साबित कर दिया कि जब कॉरपोरेट संवेदनशीलता और सामाजिक सेवा का संगम होता है, तो समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक भी खुशहाली की किरण पहुँच सकती है।
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