
उदयपुर। जब हौसलों को सही अवसर के पंख मिल जाएं, तो गाँव की पगडंडियों से वैश्विक करियर तक का रास्ता छोटा लगने लगता है। उदयपुर के एक छोटे से गाँव ‘भामनिया खेत’ की रहने वाली दीपिका की कहानी कुछ ऐसी ही है। सीमित संसाधनों और अवसरों की कमी के बीच पली-बढ़ी दीपिका ने हिंदुस्तान जिंक के ‘जिंक कौशल’ कार्यक्रम से फूड एंड बेवरेज सर्विसेज का प्रशिक्षण लिया। इस एक फैसले ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और आज वे स्पेन की ‘मरेला क्रूजेस’ में काम कर रही हैं। दीपिका की यह सफलता न केवल उनके आत्मनिर्भर होने की कहानी है, बल्कि ग्रामीण अंचल की बेटियों के बड़े सपने देखने और उन्हें सच करने के अटूट विश्वास का प्रतीक है।
10,000 से अधिक जिंदगियों में घुला खुशियों का ‘जिंक’
दीपिका जैसी हजारों सफलता की कहानियां हिंदुस्तान जिंक के प्रमुख कौशल विकास कार्यक्रम ‘जिंक कौशल’ की देन हैं। वर्ष 2019 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के तहत राजस्थान और उत्तराखंड के ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों के 10 हजार से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई गई है।
26 करोड़ की आजीविका पहल: इस दूरदर्शी कार्यक्रम में लगभग 26 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जिसने हजारों परिवारों को आजीविका की सुरक्षा देकर उनके जीवन को खुशहाल बनाया है।
45% महिला भागीदारी: रूढ़ियों को तोड़ते हुए इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित होने वाले कुल युवाओं में 45 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है, जो महिला सशक्तिकरण की एक बेहद खूबसूरत और मजबूत तस्वीर पेश करती है।
मूक-बधिर युवाओं को मिला ‘ताज’ जैसी प्रतिष्ठित जगहों पर 100% रोजगार
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान इस कार्यक्रम ने कई नई ऊंचाइयों को छुआ। इस साल 2,600 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया। नाबार्ड, जेके सीमेंट, यस फाउंडेशन और बजाज फिनसर्व के सहयोग से 420 युवाओं को हुनरमंद बनाया गया।
सबसे भावुक और प्रेरणादायक पहलू विशेष रूप से दिव्यांग युवाओं के लिए चलाया गया विशेष बैच रहा। इस बैच के मूक-बधिर प्रशिक्षुओं को 100% रोजगार मिला। इन युवाओं की मेहनत और लगन को ताज फतेह प्रकाश, रेडिसन ब्लू और द फर्न रेजीडेंसी जैसे देश के बेहद प्रतिष्ठित होटलों में पहचान मिली, जहाँ वे आज ससम्मान काम कर रहे हैं।
इशारों से आतिथ्य सत्कार तक : वासिफ की प्रेरक यात्रा
उदयपुर के रहने वाले वासिफ जन्म से मूक-बधिर हैं। उन्होंने ‘जिंक कौशल’ के हॉस्पिटैलिटी प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़कर अपनी सीमाओं को पीछे छोड़ दिया। अपने करियर की शुरुआत रामाडा होटल से करने वाले वासिफ आज ताज अरावली में ‘गेस्ट सर्विस एसोसिएट’ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। सबसे खूबसूरत बात यह है कि वासिफ अब खुद जैसे अन्य श्रवण-बाधित युवाओं के मार्गदर्शक बन चुके हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
रोजगार दर और मुख्यधारा से जुड़ाव
83% प्लेसमेंट दर: इस कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका प्लेसमेंट रिकॉर्ड 83 प्रतिशत है, जिसमें प्रशिक्षण के बाद युवाओं के वेतन में औसतन 16 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
दिग्गज कंपनियों में सेवाएं: यहां से निकले युवा आज टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), फॉक्सकॉन, होंडा, मरेला क्रूजेस और जीएमआर ग्रुप जैसे वैश्विक स्तर के संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
स्मार्ट पुलिसिंग और सुरक्षा: उदयपुर पुलिस विभाग के सहयोग से इस पहल के तहत युवाओं को प्रशिक्षित कर मुख्यधारा के रोजगार से जोड़ने का काम किया जा रहा है।
अंबुजा फाउंडेशन और टाटा स्ट्राइव के साथ मजबूत साझेदारी
यह पूरा अभियान अंबुजा फाउंडेशन और टाटा स्ट्राइव के सहयोग से राजस्थान के देबारी, दरीबा, जावर, चित्तौड़गढ़, आगूचा और कायड़ स्थित अत्याधुनिक कौशल केंद्रों के माध्यम से चलाया जा रहा है। पूर्व में उत्तराखंड के पंतनगर में भी इसका सफल संचालन किया गया। युवाओं के भविष्य को संवारने और बेहतरीन रोजगार सृजन के लिए इस कार्यक्रम को राजस्थान सरकार द्वारा चार जिला स्तरीय पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है।
विश्व युवा कौशल दिवस के अवसर पर दीपिका और वासिफ जैसी भावना से भरी कहानियां यह साबित करती हैं कि यदि हमारी ग्रामीण प्रतिभाओं को सही समय पर सही अवसर और स्नेह मिले, तो वे न सिर्फ अपनी गरीबी और मजबूरियों को हरा सकती हैं, बल्कि पूरे देश का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन कर सकती हैं।
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