मुंबई पुलिस इन दिनों एक ऐसे मामले की जाँच में जुटी है, जिसने सोशल मीडिया पर गर्मागर्म बहस छेड़ दी है। यूट्यूबर समय रैना का कॉमेडी शो ‘इंडियाज गॉट लैटेंट’ अश्लीलता के आरोपों से घिर गया है। हालाँकि समय रैना ने विवादित एपिसोड्स को अपने चैनल से हटा दिया है, लेकिन माफी मांगने से उन्होंने अब तक इनकार किया है।
क्या है मामला?
शो में प्रतिभागियों और जजों द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों ने ना केवल दर्शकों को नाराज़ किया, बल्कि भाजपा नेता द्वारा दर्ज कराई गई FIR और राष्ट्रीय महिला आयोग के नोटिस ने इसे कानूनी दायरे में भी खड़ा कर दिया। इनमें एक जज, रणवीर इलाहाबादिया, ने प्रतिभागी से विवादित सवाल किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
इसी शो के जज और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, अपूर्व मखीजा उर्फ़ ‘रिबेल किड’, और आशीष चंचलानी ने भी मुंबई पुलिस के सामने बयान दर्ज करवाए। उनका कहना है कि यह शो न तो स्क्रिप्टेड था और न ही इसके लिए उन्हें कोई फीस दी गई थी। टिकट्स की कमाई शो के विजेता को दी जाती थी।
अश्लीलता या कॉमेडी का नया रूप?
शो की “नो-फिल्टर” पॉलिसी के तहत प्रतिभागियों और जजों को बिना किसी रोक-टोक के बोलने की आज़ादी दी गई। लेकिन ‘बोलने की आज़ादी’ की आड़ में, शो के दौरान कई ऐसी टिप्पणियाँ की गईं, जिन्हें समाज अश्लील और आपत्तिजनक मान रहा है।
अपूर्व मखीजा ने पुलिस को यह स्पष्ट किया कि शो का कोई भी हिस्सा पहले से तय नहीं होता था। फिर भी, शो में बार-बार “माँ-बाप का संभोग” और इसी तरह की अश्लील बातें सुनने के बाद दर्शकों ने इसे हास्य कम, और अभद्रता अधिक करार दिया।
राजनीतिक और सामाजिक दबाव
इस विवाद ने न केवल दर्शकों, बल्कि राजनीतिक गलियारों और महिला संगठनों का भी ध्यान खींचा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए चारों इन्फ्लुएंसर्स से जवाब माँगा है। वहीं, गुवाहाटी पुलिस की एक टीम भी FIR की जाँच के लिए मुंबई पहुँची है।
समय रैना का बयान
समय रैना ने सोशल मीडिया पर लिखा:
“मेरा उद्देश्य सिर्फ लोगों को हँसाना और खुश रखना था। मैं एजेंसियों के साथ पूरी तरह सहयोग करूँगा।”
लेकिन यह सफाई आलोचकों के गुस्से को शांत नहीं कर पाई।
सोशल मीडिया की भूमिका और वायरल क्लिप्स
सोशल मीडिया पर शो की विवादित क्लिप्स तेज़ी से वायरल हो गईं। लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति और महिलाओं के प्रति अशालीनता का प्रतीक बताते हुए समय रैना और उनकी टीम को कठघरे में खड़ा किया।
क्या ‘नो-फिल्टर’ का मतलब है कोई सीमा नहीं?
यह मामला समाज में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या मनोरंजन और हास्य के नाम पर ऐसी भाषा को स्वीकार किया जा सकता है? या फिर यह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती स्वतंत्रता के साथ जुड़ी एक खतरनाक प्रवृत्ति है?
मुंबई पुलिस और अन्य एजेंसियों की जाँच यह तय करेगी कि इस मामले में कानून क्या कहता है। लेकिन एक बात तय है—इस विवाद ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ‘आजादी’ और ‘जवाबदेही’ के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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