
बर्लिन। कल्पना कीजिए, एक नन्हा बेजुबान जीव, जो इंसानों की बस्ती से दूर लहरों के बीच रहता है, जब दर्द की इंतहा हो जाए तो वह कहां जाए? जर्मनी के ब्रेमेन शहर में कुदरत का एक ऐसा ही भावुक कर देने वाला नजारा देखने को मिला, जहाँ एक घायल समुद्री पक्षी (कॉर्मोरेंट) मौत से बचने के लिए खुद ‘इमर्जेंसी वार्ड’ के दरवाजे पर जा पहुँचा।
कांच के दरवाजे पर उम्मीद की चोट
रविवार की सुबह, ‘क्लिनिकम लिंक्स डेर वेसर’ अस्पताल के सन्नाटे को एक अजीब सी आवाज ने तोड़ दिया। कोई लगातार अस्पताल के कांच वाले दरवाजे को खटखटा रहा था। जब मेडिकल स्टाफ ने पास जाकर देखा, तो उनकी आँखें फटी रह गईं। बाहर एक चमकदार काले पंखों वाला कॉर्मोरेंट (पनकौआ) खड़ा था। वह डरा हुआ था, सहमा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में जीने की एक आखिरी उम्मीद थी।
तिहरा कांटा और असहनीय पीड़ा
उस नन्हे पक्षी की चोंच में मछली पकड़ने वाला एक तिहरा हुक (Triple Hook) बुरी तरह धंसा हुआ था। वह न तो अपनी चोंच खोल पा रहा था और न ही कुछ निगल पा रहा था। हर बीतता लम्हा उसे भूख और संक्रमण की वजह से मौत के करीब ले जा रहा था। अपनी प्राकृतिक शर्मीली फितरत को छोड़कर, वह पक्षी शायद यह समझ चुका था कि अब केवल ये ‘इंसान’ ही उसकी आखिरी ढाल हैं।
देवदूत बने डॉक्टर और दमकलकर्मी
अस्पताल के कर्मचारियों ने बिना देर किए दमकल विभाग को बुलाया। डॉक्टरों और दमकलकर्मियों ने मिलकर एक नाजुक ‘ऑपरेशन’ शुरू किया। एक तरफ इंसानी हाथ थे और दूसरी तरफ एक नन्ही सी जान, जो दर्द से कराह रही थी। बहुत ही सावधानी से उस जानलेवा हुक को निकाला गया और घाव पर मरहम लगाया गया।
पंखों को मिली फिर से उड़ान
विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई जंगली जीव इंसानों के इतना करीब आता है, तो समझ लीजिए कि उसका दर्द उसकी जान के डर से कहीं बड़ा हो गया है। राहत की बात यह रही कि इलाज के बाद वह पक्षी फिर से चहकने लगा। उसे अस्पताल के ही हरे-भरे पार्क में आजाद कर दिया गया।
आज वह पक्षी खुले आसमान में उड़ रहा होगा, लेकिन उसकी वह ‘दरवाजे पर दस्तक’ अस्पताल के स्टाफ और दुनिया को यह सिखा गई कि दर्द की कोई भाषा नहीं होती, बस समझने वाला दिल चाहिए।
source : The Associated Press.
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