
उदयपुर। अंजुमन तालीमुल इस्लाम के नए सदर के तौर पर मुख़्तार कुरैशी का चुनाव महज़ एक इलेक्शन नहीं, बल्कि एक उम्मीद की लौ है। इस बार के इंतेख़ाबात (चुनाव) में जो गर्मजोशी और बेताबी देखने को मिली, वो इस बात की गवाही है कि कौम अपने तालीमी और समाजी इदारों (संस्थाओं) के मुस्तकबिल को लेकर संजीदा है।
सामाजिक पहलू : एक ज़िम्मेदार कौम की झलक
इस बार की काबीना में तालीमयाफ्ता (पढ़े-लिखे) अफ़राद की शमूलियत एक इंकलाबी क़दम है। ये इस बात की दलील है कि अंजुमन महज़ रस्मी इदारा नहीं, बल्कि एक ऐसी तहरीक है जो तालीम, तहज़ीब और तरक़्क़ी के रास्ते पर आगे बढ़ने का इरादा रखती है।
लेकिन यहां एक बहुत अहम बात यह भी है कि इन मुन्तख़ब नुमाइंदों को तहज़ीब और सब्र के साथ काम करने का माहौल दिया जाए। समाज को यह समझना होगा कि जो लोग मैदान-ए-अमल में होते हैं, उनसे ख़ता (गलती) भी होती है, लेकिन इस्लाह (सुधार) मुमकिन है। लगातार तन्क़ीद (आलोचना) और बदतमीज़ी न सिर्फ इदारे की साख को नुक़सान पहुंचाती है, बल्कि पूरी कौम को इर्तिजा (पिछड़ने) की तरफ धकेलती है।
सियासी तज़्ज़िया: लोकतंत्र, अक़्ल और वक़्त की ज़रूरत
ये बात वाज़ेह है कि इंतेख़ाब से पहले जो वादे किए गए, उन्हें पूरा करने में वक़्त लगेगा। लेकिन सच्ची नीयत और मुनासिब हिकमत-ए-अमली (रणनीति) से हर मंज़िल पाई जा सकती है। मसलन, जब मुल्क की अवाम ने वज़ीरे आज़म नरेंद्र मोदी को बार-बार मौका दिया, तो ये इसी उम्मीद पर था कि वो देश की सूरत-ए-हाल (स्थिति) को बेहतर करेंगे। कितनी तब्दीली आई है, ये अलग बात है, मगर इम्तिहान और सब्र हर सियासी निज़ाम की बुनियाद होते हैं।
अंजुमन का निज़ाम भी एक तरह से जम्हूरी निज़ाम है। यहां भी ज़रूरी है कि फ़ैसले बहुमत की बुनियाद पर लिए जाएं। हर शख़्स की राय अहम है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर एक की सोच हक़ीक़त के सबसे क़रीब हो। यह इंसानी फितरत है कि इंसान अपनी बात को ही सबसे सही समझता है। लेकिन अगर जमाअत (समूह) में इत्तेहाद (एकता) नहीं होगा, तो न तालीम तरक़्क़ी करेगी, न समाज।
रूहानी और तहज़ीबी पहलू: इस्लामी उसूलों की रोशनी में
हज़रत मोहम्मद (ﷺ) का ज़िक्र इस सिलसिले में बेहद मुनासिब है। उन्होंने हर अहम क़दम उठाने से पहले शूरा (परामर्श) का सहारा लिया। ये पैग़ाम आज भी हमारे लिए रहनुमाई करता है कि किसी भी फैसले से पहले अहले-राय (ज्ञानी और ईमानदार लोग) से मशविरा ज़रूरी है।
नई काबीना के लिए ये सुब्ह-ए-नौ (नई सुबह) है। लेकिन हर सुबह से पहले एक लंबी रात होती है। इस सफ़र में अंधेरे भी आएंगे, अज़माइशें भी होंगी, लेकिन हमें हर रोज़ की शुरुआत उसी उम्मीद और उजाले के साथ करनी होगी, जो एक अच्छे निज़ाम और एक ज़िंदा कौम की पहचान होती है।
इख़्तितामिया (निष्कर्ष): क़ौमी तरक़्क़ी का रास्ता
आज अंजुमन एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है। यह वक्त तफ़रीक़ (विभाजन) का नहीं, बल्कि इत्तिहाद (एकता) का है। इस काबीना को मोहब्बत, मशविरा और मुहाफ़िज़त की ज़रूरत है। यह इदारा महज़ किसी एक मोहल्ले या गिरोह की मिल्कियत नहीं है, बल्कि यह पूरी क़ौम की अमानत है।
अगर हम अपने अंदर से नफ़रत, शुबहात और बदगुमानियों को निकाल दें, तो यक़ीन मानिए, अंजुमन तालीमुल इस्लाम ना सिर्फ एक इदारा बनेगा, बल्कि कौमी शिनाख़्त और फख़्र का मरकज़ भी बन जाएगा।
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