
आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट…
रोहतास जिले के एक छोटे से गांव बड्डी की कच्ची गलियों में, धूल से सनी पैंट, फटी हुई गेंद और एक सपना लिए, एक लड़का रोज़ मैदान में गेंदबाज़ी करता था। उसका नाम था आकाशदीप सिंह। गांव में क्रिकेट खेलना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन आकाश का जुनून बड़ा था, उसके इरादे उससे भी बड़े।
पर हर शाम जब वह थका हुआ घर लौटता, तो उसका स्वागत किसी ट्रॉफी से नहीं, बल्कि पिता की डांट से होता था। पिता चाहते थे कि बेटा पढ़े-लिखे, किसी सरकारी नौकरी में जाए—क्योंकि एक शिक्षक पिता के लिए सबसे बड़ी पूंजी बेटा नहीं, उसकी पढ़ाई होती है।
संघर्षों के बीच पलता एक सपना
आकाश के लिए क्रिकेट धर्म था, लेकिन उसके घर में क्रिकेट “समय की बर्बादी” माना जाता था। पिता अक्सर डांटते—पर आकाश चुपचाप अगली सुबह फिर मैदान में उतर जाता।
जब उसकी मेहनत रंग लाने लगी, और वह बंगाल जाकर स्थानीय टूर्नामेंट खेलने लगा, तभी जिंदगी ने एक और मोड़ ले लिया—उसके पिता का निधन हो गया।
उस दिन उसने न केवल पिता को खोया, बल्कि अपने सबसे बड़े आलोचक को भी, जो शायद अंदर ही अंदर उसके सपनों से प्यार करता था, पर कभी जता नहीं पाया।
भाई की छांव भी गई
पिता के बाद, परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई पर आ गई। मां, बहन और आकाश—सब अब उसी भाई के भरोसे थे। भाई ने कभी शिकायत नहीं की। आकाश के मैचों के लिए पैसे जुटाए, बहन की पढ़ाई संभाली, मां का इलाज कराया। लेकिन दुर्भाग्य से, कुछ ही महीनों बाद बड़े भाई का भी निधन हो गया।
उस दिन आकाश सिर्फ अकेला नहीं हुआ, बल्कि टूट चुका था।
पर वह टूटा नहीं। उसने खुद को समेटा, मां को संभाला, बहन के लिए दीवार बन गया और फिर से मैदान में लौट आया।
जिंदगी फिर आई इम्तहान लेकर…
जैसे ही वह भारतीय टीम में अपनी जगह बना पाया, एक और बुरी खबर आई।
अप्रैल 2025, उसकी बहन अखंड ज्योति को स्टेज-3 कोलन कैंसर का पता चला।
वह लखनऊ में थी, और आकाश आईपीएल खेल रहा था। हर दिन का खेल ख़त्म होता, और वह सीधा अस्पताल पहुंचता।
ज्योति बताती हैं—”वो थका होता था, लेकिन कभी चेहरा नहीं लटकाता। कहता—दीदी, आप ठीक हो जाओ, मैं भी एक दिन टीम इंडिया के लिए खेलूंगा।”
एजबेस्टन में जब भावनाएं उबलने लगीं…
2025 की जुलाई। भारत बनाम इंग्लैंड का टेस्ट मैच, एजबेस्टन।
आकाशदीप की गेंदबाज़ी में कुछ अलग ही आग थी। उसने पूरे मैच में 10 विकेट झटके।
जब मीडिया ने पूछा, इस प्रदर्शन का राज क्या है?
वह भावुक हो उठा—”जब भी गेंद हाथ में आती थी, मेरे मन में मेरी बहन की मुस्कान घूमती थी। मैंने सब कुछ खोया है—पापा, भैया… अब मेरी दीदी ही मेरी ताकत हैं। यह जीत मैं उन्हें समर्पित करता हूं।”
लखनऊ की वो खामोश, मगर चमकती आंखें
आज उसकी बहन लखनऊ के वृंदावन कॉलोनी में, कीमोथेरेपी के बीच भाई के लिए ताली बजा रही है। उनके शरीर में कमजोरी है, लेकिन आंखों में दुनिया जीत लेने का आत्मविश्वास।
उन्होंने कहा—”मैं दर्द में हूं, लेकिन भाई की जीत ने मुझे ताकत दी है। मुझे पूरा यकीन है, वो एक दिन भारत के सबसे बेहतरीन तेज गेंदबाजों में होगा।”
पिता की डांट, भाई की जिम्मेदारी और बहन की दुआ
आकाशदीप की यह कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की नहीं है, एक इंसान की है, जिसने हर मोड़ पर खोया, लेकिन खुद को कभी खोने नहीं दिया। वह लड़का, जिसे कभी क्रिकेट खेलने पर डांट मिलती थी, आज उसी खेल के लिए भारत के माथे का ताज बन चुका है।
जिसके भाई ने उसे आगे बढ़ने के लिए अपने कंधे झुका दिए, और जिसके लिए बहन ने कीमोथेरेपी के बीच मुस्कराना नहीं छोड़ा—उसी आकाशदीप ने एजबेस्टन की हवा में इतिहास रच दिया।
आखिरी शब्द : ये सिर्फ क्रिकेट नहीं था… ये एक वादा था।
जब उसने दसवां विकेट लिया, और आंखें आसमान की तरफ उठाईं—शायद वह अपने पापा को देख रहा था, शायद भाई को, शायद बहन के चेहरे की झलक थी। लेकिन उस क्षण, सिर्फ एक बात सच थी—”यह जीत सिर्फ भारत की नहीं, एक परिवार की थी जिसने सब कुछ खोकर भी उम्मीद थामी रखी थी।”
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