
उदयपुर। गुलाब बाग़ स्थित दरगाह-ए-पाक हज़रत शाह सय्यद अब्दुल शकूर साबिर अली चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह—जिन्हें अकीदतमंद इमली वाले बाबा के ख़िताब से याद करते हैं—का 292वाँ सालाना उर्स मुबारक आज गुरुवार के दिन कुल की फ़ातिहा और महफ़िल-ए-समा के दिलनशीं प्रोग्राम के साथ परवाज़-ए-कामिल को पहुँचा।
समापन के मौक़े पर हज़रत अमीर ख़ुसरो रहमतुल्लाह अलैह का मारूफ़ कलाम
“आज रंग है ऐ री मां” पेश किया गया, जिसने महफ़िल को इश्क़ और सुक़ून के रंगों से महका दिया।
महफ़िल-ए-आग़ाज़ : हम्द व नात की ख़ुशबू। दरगाह इंतज़ामिया कमेटी के प्रवक्ता मोहम्मद रफ़ीक़ शाह ‘बहादुर’ के मुताबिक आज बाद नमाज़-ए-जुहर महफ़िल-ए-रंग का आग़ाज़ हुआ।
साय्यद अनस अली क़ादरी और हाफ़िज़ क़ादरी ने हम्द, नात और मनक़बत से रूहानी फज़ा पैदा की। उन्होंने ये ख़ूबसूरत कलाम पेश किया…“ज़िंदगी ये नहीं है किसी के लिए, ज़िंदगी है नबी की, है नबी के लिए” जिसने समा बाँध दिया और महफ़िल के सुकून में नूरानी इज़ाफ़ा किया।
कव्वालों का कलामी सफ़र
उसके बाद महफ़िल-ए-समा का असल दौर शुरू हुआ।
दिल्ली के कव्वाल नज़ीर अली क़ादरी का कलाम
दिल्ली से तशरीफ़ लाए मशहूर कव्वाल नज़ीर अली क़ादरी और उनकी पार्टी ने कलाम
“कलाम-ए-हक़ में ये लिखा हुआ है, नूर-ए-हक़ हैं मोहम्मद” पेश किया, जिसे सुनकर सामेईन इश्क़ और आरज़ू की कैफ़ियत में डूब गए।
दरगाह के पगड़ीबंद कव्वालों की पेशकश
इसके बाद दरगाह के पगड़ीबंद कव्वाल नज़ीर आसिफ नियाज़ी और उनकी पार्टी ने इश्क़-ए-अली में रंगा हुआ जोशीला कलाम पेश किया “बोल रहा है तन-मन सारा अली अली, बोलो नारा अली अली” और महफ़िल तालियों और दाद से गूंज उठी।
ज़ायरीन की आमद और अकीदत का इज़हार
उर्स मुबारक के पुरसुकून मौके पर बड़ी तादाद में अकीदतमंद हाज़िर हुए।
किसी ने अपनी निस्बत और मोहब्बत के तौर पर चादर, फूल और इत्त्र पेश किया,
तो कई ज़ायरीन ने तबर्रूक के रूप में पुलाव, दलीम (खिचड़ा), मिठाइयां तक़सीम कीं और ख़ुशबूदार महफ़िल को ख़ैरात की बरकत से महका दिया।
कुल की फ़ातिहा और दुआ-ए-अमन
असर की नमाज़ के बाद हाफ़िज़ तौकीर रज़ा ने कुल की फ़ातिहा पढ़ी और तमाम ज़ायरीन, मुल्क में अम्न-ओ-अमान, खुशहाली और तरक़्क़ी के लिए दुआएं कीं। फ़ातिहा के बाद ज़ायरीन को कुल के छींटे भी तबर्रूक के तौर पर दिए गए। कमेटी प्रशासन व नगर निगम का सहयोग के लिए आभार जताया।
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