
फोटो : कमल कुमावत
उदयपुर। पर्यटन विभाग ने सतोलिया को भुलाया, जयपुर–अहमदाबाद की नकल में उलझा उदयपुर
आसमान में पतंगें और दिलों में उमंगें—यह दृश्य भले ही आकर्षक लगे, लेकिन मकर संक्रांति पर उदयपुर में आयोजित पतंग उत्सव ने एक कड़वा सवाल भी खड़ा कर दिया है। क्या झीलों की नगरी अपनी मूल लोक-परंपराओं को भूलकर केवल बड़े शहरों की नकल तक सिमटती जा रही है?
मकर संक्रांति पर जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग के तत्वावधान में फतहसागर, पिछोला, मोतीमगरी और सज्जनगढ़ जैसे पर्यटन स्थलों पर भव्य पतंग उत्सव आयोजित किए गए। “काई… पो… छे…” की गूंज, रंग-बिरंगी पतंगें और तिल-गुड़ की मिठास—सब कुछ वैसा ही रहा जैसा जयपुर या अहमदाबाद में वर्षों से देखा जा रहा है।

लेकिन इस चकाचौंध में मेवाड़ की पहचान रहे पारंपरिक खेल ‘सतोलिया’ की अनुपस्थिति खटकती रही।
सतोलिया, जो कभी मकर संक्रांति पर गली-मोहल्लों से लेकर चौपालों तक बच्चों और युवाओं का प्रिय खेल हुआ करता था, इस बार पूरी तरह हाशिये पर नजर आया। नई पीढ़ी के लिए यह खेल अब केवल बुजुर्गों की स्मृतियों तक सिमटता जा रहा है, और इसका बड़ा कारण वही संस्थाएं हैं जिन पर लोक-संस्कृति को संजोने की जिम्मेदारी है।

पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में प्रशासनिक अधिकारी पतंग उड़ाते दिखे, सैकड़ों लोग जुटे और आयोजन को ‘जनोत्सव’ का रूप दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल भीड़ और रंगीन तस्वीरें ही संस्कृति का मापदंड हैं?
यदि उदयपुर को सच में सांस्कृतिक पर्यटन का केंद्र बनाना है, तो उसे अपनी विशिष्ट परंपराओं को सामने लाना होगा, न कि दूसरों के उत्सवों की नकल करनी होगी।
झामर-कोटड़ा सहित अन्य क्षेत्रों में भी पतंग उत्सव की रौनक दिखी, पर्यावरण और पक्षी सुरक्षा के संदेश दिए गए—यह सराहनीय है। परंतु साथ ही यदि सतोलिया जैसे पारंपरिक खेलों को मंच मिलता, तो मकर संक्रांति का उत्सव केवल रंगीन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भी होता।

आज जरूरत इस बात की है कि पर्यटन विभाग उत्सवों को केवल आयोजन न माने, बल्कि उन्हें लोक-परंपराओं के संरक्षण का माध्यम बनाए। नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब उदयपुर की आने वाली पीढ़ी सतोलिया का नाम भी किसी किताब या पुराने किस्से में ही पढ़ेगी।
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