
उदयपुर। युद्ध चाहे सरहदों पर हो या किसी संस्थान के भीतर, जीत किसी की भी हो, हार हमेशा उस ‘नींव’ की होती है जिस पर वह ढांचा खड़ा होता है। मेवाड़ की आन-बान और शान का प्रतीक विद्या प्रचारिणी सभा (भूपाल नोबल्स) आज जिस दोराहे पर खड़ी है, वह हर उस व्यक्ति के लिए पीड़ादायक है जो शिक्षा और संस्कारों की कद्र करता है। जिस तरह वैश्विक युद्धों का अंत केवल टेबल पर बैठकर शांति वार्ता से होता है, उसी तरह बीएन के इस गतिरोध का समाधान भी आपसी सहमति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में ही छिपा है।
संस्थान की वर्तमान स्थिति और विवाद के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
एडहॉक कमेटी और गहराता सियासी घमासान
संस्थान में विवाद की चिंगारी तब भड़की जब चेयरमैन विश्वराज सिंह मेवाड़ द्वारा 11 सदस्यीय एडहॉक कमेटी के गठन का निर्णय लिया गया। इस फैसले ने सभा के सदस्यों को आक्रोशित कर दिया है। पूर्व जिला प्रमुख और सभा सदस्य भैरूसिंह ने कड़े तेवर अपनाते हुए इसे पूरी तरह ‘अलोकतांत्रिक’ करार दिया है। उनका तर्क है कि जब चुनाव प्रक्रिया एक बार शुरू हो जाती है, तो उसे बीच में इस तरह के फैसलों से बाधित नहीं किया जा सकता।
वैधानिक और लोकतांत्रिक सवाल
विवाद का एक बड़ा पहलू यह है कि क्या चेयरमैन के पास कार्यकारिणी को हटाने या मनोनीत करने का अधिकार है?
विधायक सुरेंद्र सिंह राठौड़ (कुंभलगढ़): उन्होंने स्पष्ट किया कि 103 साल के गौरवशाली इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि मनोनयन की परंपरा शुरू हुई तो लोकतंत्र का आधार ही खत्म हो जाएगा।
संविधान की सर्वोच्चता: कार्यकारिणी के सदस्यों का मानना है कि सभा का अपना एक लिखित संविधान है, जिसके तहत समाधान केवल लोकतांत्रिक चुनाव से ही निकलना चाहिए।
ऑडिट और प्रशासनिक गतिरोध
विवाद के पीछे केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है:
कार्यकाल की समाप्ति : प्रबंधन का कार्यकाल 12 फरवरी, 2026 को समाप्त हो चुका है।
ऑडिट मेमो : कोर्ट के आदेश पर हो रही ऑडिट में 60 मेमो का जवाब न देना और रिकॉर्ड के साथ पारदर्शिता न बरतने के आरोप भी प्रबंधन पर लगे हैं। इसी खींचतान के बीच जब एडहॉक कमेटी चार्ज लेने पहुंची, तो दफ्तरों पर ताले लटके मिले।
विरासत की संवेदना और वर्तमान का दर्द
महाराणा भूपाल सिंह जी द्वारा समाज को दी गई यह अनमोल सौगात आज पुलिस जाब्ते के बीच सिसक रही है। पूर्व राजपरिवार के सदस्य डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने भी अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया है। उनका मानना है कि विद्यार्थियों और गुरुजनों का भविष्य ही सर्वोपरि है, जिसकी सुरक्षा वर्तमान के इन विवादों से ऊपर उठकर होनी चाहिए।
जैसा कि हमने दुनिया भर के युद्धों से सीखा है, जिद और अहंकार केवल बर्बादी लाते हैं। बीएन संस्थान किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों का भविष्य और मेवाड़ की विरासत है। यदि समय रहते ‘संवाद’ का रास्ता नहीं अपनाया गया और टकराव जारी रहा, तो इस प्रतिष्ठित संस्थान को जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई आने वाली कई पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी। आखिर में लौटना तो शांति की ओर ही होगा, तो क्यों न इसकी शुरुआत आज और अभी की जाए?
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