
उदयपुर। लेक सिटी उदयपुर में इन दिनों सूरज की तपिश और भीषण गर्मी के बीच बिजली विभाग की चरमराई व्यवस्था ने आमजन का जीना दुभर कर दिया है। शहर के कई इलाकों में सुबह से लेकर शाम तक और यहां तक कि आधी रात को कई-कई घंटों तक अघोषित बिजली कटौती (पावर कट) की जा रही है। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि विद्युत निगम के दफ्तरों में जनता की सुध लेने वाला और उनकी शिकायतों को सुनने वाला कोई जिम्मेदार मौजूद ही नहीं है। विभाग की यह संवेदनहीनता अब आमजन के सब्र का बांध तोड़ रही है।
बैठकों में कसी जा रही कागजी घुड़की, ग्राउंड पर बत्ती गुल
विद्युत निगम की कार्यप्रणाली का सबसे मजेदार और स्याह पहलू यह है कि जब स्थानीय विधायक या जिला कलेक्टर निगम के इंजीनियरों की बैठक लेकर व्यवस्था सुधारने के कागजी निर्देश दे रहे होते हैं, ठीक उसी समय भी शहर के कई इलाकों में बिजली गुल रहती है। अफसरों की यह कैसी समीक्षा बैठकें हैं, जिनका ग्राउंड पर कोई असर ही नहीं दिख रहा है? वीआईपी बैठकों के दौर के बीच जनता बूंद-बूंद पसीने में तर होने को मजबूर है।
आधी रात को घंटों गुल रहती है बिजली, पुरोहितों की मादड़ी में नरकीय हालात
उदयपुर शहर सहित खासकर पुरोहितों की मादड़ी और उसके आस-पास के इलाकों में तो हालात पूरी तरह नरकीय हो चुके हैं। क्षेत्रीय निवासी और फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत ने बताया कि इन इलाकों में शाम ढलते ही बिजली जाने का जो सिलसिला शुरू होता है, वह आधी रात तक जारी रहता है। रात को कई-कई घंटों की अघोषित कटौती के कारण न तो बच्चे सो पा रहे हैं और न ही बुजुर्ग व बीमार लोग। दिनभर की भयंकर उमस और गर्मी के बाद रात को भी लोगों को बिना बिजली के तड़पना पड़ रहा है।
प्रतापनगर जीएसएस पर पसरा सन्नाटा : न फोन उठता है, न कर्मचारी मिलता है
शिकायत निवारण के नाम पर निगम ने जो दफ्तर खोले हैं, वे सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। प्रतापनगर जीएसएस (GSS) कार्यालय का हाल यह है कि यहां शिकायत दर्ज कराने पहुंचने वाले उपभोक्ताओं को सुनने वाला कोई नहीं है। दफ्तर से कर्मचारी नदारद रहते हैं और हेल्पलाइन नंबर या तो व्यस्त आते हैं या उन्हें उठाकर पटक दिया जाता है। जनता परेशान होकर कहाँ जाए, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है।
कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन, जागने की जरूरत
निगम के इंजीनियर और उच्च अधिकारी पूरी तरह से एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर कुंभकर्णी नींद सोए हुए हैं। उन्हें धरातल पर तड़प रही जनता की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं। जिला प्रशासन और उच्च स्तर पर बैठे नीति निर्धारकों को इस गंभीर लापरवाही का तुरंत संज्ञान लेने की जरूरत है। अगर समय रहते अघोषित कटौती पर लगाम नहीं कसी गई और लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर बड़े आंदोलन के रूप में फूट सकता है।
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