धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा—मोदी सरकार की रणनीति में बड़ा बदलाव या मजबूरी? पढ़ें 5 बड़े कारण

नई दिल्ली। देश की राष्ट्रीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में शनिवार का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया। नीट (NEET) और परीक्षा धांधलियों को लेकर बीते एक महीने से भी अधिक समय से जारी छात्र आंदोलनों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

वर्ष 2014 के बाद से यह पहला अवसर है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को किसी व्यापक सार्वजनिक आंदोलन या विरोध प्रदर्शन के सीधे दबाव में आकर अपने किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा है।

लेकिन सवाल उठता है कि—अचानक ऐसा क्या बदला कि सरकार को यह फैसला लेना पड़ा? क्या यह सरकार के लिए एक बड़ा झटका है या फिर एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति?

आइए, इस पूरे घटनाक्रम का 5 प्रमुख पहलुओं के माध्यम से बारीक विश्लेषण करते हैं:

1. ‘नो रेजिग्नेशन’ नीति में पहली बड़ी दरार

बीते एक दशक में मोदी सरकार की एक खास प्रशासनिक पहचान रही है—विपक्ष या प्रदर्शनकारियों के दबाव में आकर कभी भी मंत्रियों का इस्तीफा न लेना। चाहे किसान आंदोलन हो या अन्य बड़े राजनीतिक मुद्दे, सरकार ने हमेशा दबाव के आगे झुकने से परहेज किया।

वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने सरकार की इस ‘दृढ़ छवि’ वाले अलिखित नियम को तोड़ दिया है। जेपी आंदोलन जैसे ऐतिहासिक जनांदोलनों को बदलाव लाने में सालों लग गए थे, जबकि इस गैर-राजनीतिक छात्र आंदोलन ने महज 36 दिनों के भीतर अपनी मुख्य मांगों में से एक को मनवा लिया।

2. वे 3 टर्निंग पॉइंट्स, जिन्होंने आंदोलन को पूरे देश में फैलाया

जून के महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ प्रदर्शन शुरुआती हफ़्तों में बेहद सीमित था। लेकिन तीन प्रमुख घटनाओं ने इस आंदोलन की आग को देश के कोने-कोने में फैला दिया:

सोनम वांगचुक का निष्कासन : अनशन स्थल से पर्यावरण कार्यकर्ता और विचारक सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा हटाए जाने से आम जनता और युवाओं में भारी नाराजगी फैली।

20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई : संसद मार्च के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज और वाटर कैनन के इस्तेमाल के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसके बाद बॉलीवुड, खेल और नागरिक समाज से जुड़े प्रमुख चेहरे छात्रों के समर्थन में आ गए।

देशभर में स्वतः स्फूर्त प्रदर्शन : देखते ही देखते पटना, जयपुर, लखनऊ, पुणे, मुंबई, और यहां तक कि छोटे कस्बों तक में युवा सड़कों पर उतर आए।

3. संघ (RSS) का नैतिक दबाव और मोहन भागवत का बयान

इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का रुख भी बेहद निर्णायक साबित हुआ। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा था-“आज की नई पीढ़ी सवाल पूछती है, उसे चुप कराने के बजाय तर्क और अपनापन देने की जरूरत है।”

संघ प्रमुख के इस बयान को सीधे तौर पर छात्रों की चिंताओं के प्रति सरकार के कड़े रुख पर एक आंतरिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया। संघ की ओर से आए इस नैतिक दबाव ने भी सरकार को बैकफुट पर धकेला।

4. ‘कॉकरोच’ तंज और डिजिटल युग का नया आंदोलन

यह आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक दलों के झंडे तले नहीं, बल्कि खुद छात्रों और युवाओं द्वारा संचालित था। न्यायपालिका की एक मौखिक टिप्पणी के संदर्भ में युवाओं ने ‘कॉकरोच’ शब्द को अपनी पहचान बना लिया और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए सोशल मीडिया, मीम्स और रील्स का सहारा लेकर अपनी बात रखी। इस नए अंदाज़ ने पारंपरिक राजनीति को चौंका दिया और यह साबित किया कि आज का युवा संवाद और डिजिटल लामबंदी का अपना तरीका बेहतर जानता है।

5. मोदी सरकार के लिए: झटका या आगामी चुनाव की रणनीति?

विश्लेषकों का मानना है कि इस इस्तीफे के दो पहलू हैं-

झटका क्यों? पड़ोसी देशों (नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश) में युवाओं के उग्र आंदोलनों के कारण हुए राजनीतिक उलटफेर को देखते हुए केंद्र सरकार युवाओं के इस असंतोष को और लंबा नहीं खींचना चाहती थी। परीक्षा प्रणाली पर युवाओं का भरोसा टूटना सरकार की प्रशासनिक साख के लिए बड़ा खतरा बन रहा था।

अवसर कैसे? मंत्री का इस्तीफा लेकर सरकार ने आंदोलित छात्रों का गुस्सा शांत (Damage Control) करने का प्रयास किया है। अब सरकार फास्ट-ट्रैक कोर्ट और नए पारदर्शी परीक्षा सुधारों की घोषणा करके अपनी छवि को सुधारने का प्रयास करेगी। आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले यह फैसला युवाओं के गुस्से को शांत करने की दिशा में एक अहम राजनीतिक दांव माना जा रहा है।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का हटना भर नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में जब युवा शांतिपूर्ण और तार्किक ढंग से अपनी मांगों पर अड़ जाते हैं, तो बड़ी से बड़ी सत्ता को भी जनभावनाओं का सम्मान करना पड़ता है। अब देखना यह होगा कि नया शिक्षा प्रशासन परीक्षा प्रणाली (NTA) में क्या बड़े ढांचागत सुधार लाता है।

 

About Author

Leave a Reply