
उदयपुर। राजनीति में विफलता को उत्सव में बदलना एक कला है, और उदयपुर में वंदे भारत एक्सप्रेस के मामले में यही देखने को मिल रहा है। जिस ट्रेन को कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े ताम-झाम के साथ उदयपुर-जयपुर-आगरा रूट के लिए रवाना किया था, उसी ट्रेन को अब स्थानीय सांसदों द्वारा उदयपुर-असारवा (अहमदाबाद) रूट के लिए फिर से ‘हरी झंडी’ दिखाई गई है।
सवाल यह उठता है कि क्या यह वास्तव में एक नई उपलब्धि है या सिर्फ एक असफल रूट की भरपाई करने की कोशिश? जिस ट्रेन में यात्री कम होने की वजह से रूट बदला गया, उसी ट्रेन में ‘कवरेज’ के बहाने मुफ्त सफर का आनंद लेते मीडियाकर्मी असल में उस ‘नेगेटिव’ को ढंकने में सांसदों की अनजाने में मदद ही कर रहे हैं।
विफलता का विश्लेषण करने के बजाय, उसे ‘उत्सव’ की तरह शूट करना आज के मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी है।
विफलता पर ‘समारोह’ का पर्दा
उदयपुर-जयपुर और आगरा कैंट रूट पर वंदे भारत का चलना रेलवे के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। पर्याप्त यात्री (Occupancy) न मिलने के कारण इस रूट को बंद करना पड़ा। तकनीकी रूप से यह रेलवे की एक व्यावसायिक विफलता थी। लेकिन, इस विफलता को स्वीकार करने के बजाय, उसी रैक (Train Set) को नए रूट पर डालकर उसे एक “नई सौगात” के रूप में पेश किया गया।
सांसदों की ‘झंडी’ वाली राजनीति
हैरानी की बात यह है कि जिन सांसदों के क्षेत्र में यह ट्रेन पहले रूट पर सफल नहीं हो पाई, वही सांसद अब दूसरे रूट पर उसी ट्रेन को झंडी दिखाकर वाहवाही लूट रहे हैं।
सवाल : क्या सांसदों को उस रूट की विफलता की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए थी?
तर्क : राजनीति में ‘खाली हाथ’ दिखने से बेहतर ‘पुरानी चीज को नया’ बताकर पेश करना माना जाता है। उदयपुर और चित्तौड़गढ़ के सांसदों के लिए यह जनता के बीच यह संदेश देने का जरिया बना कि “हम ट्रेन को क्षेत्र से बाहर नहीं जाने दे रहे।”
रेलवे का ‘ट्रायल एंड एरर’ मॉडल
रेलवे का यह कदम दर्शाता है कि वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनों के लिए रूट का चयन करते समय शायद पर्याप्त डेटा रिसर्च नहीं की गई थी। प्रयोग के तौर पर ट्रेन को अलग-अलग रूट पर चलाना यह बताता है कि रेलवे अभी भी “हिट एंड ट्रायल” मोड में है।
जनता में उत्साह या सिर्फ दिखावा?
स्टेशन पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, बच्चों की प्रस्तुतियाँ और ढोल-नगाड़ों के बीच यह भूल जाना आसान है कि यह वही 8 कोच वाली ट्रेन है जो कुछ दिन पहले खाली दौड़ रही थी। अहमदाबाद रूट (असारवा) पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह बस और अन्य ट्रेनों के मुकाबले समय और किराए में प्रतिस्पर्धी है।
जवाबदेही से बचती सियासत
इस पूरी घटना को ‘नेगेटिव में पॉजिटिव’ ढूंढने की कोशिश कहा जा सकता है। सांसदों ने झंडी दिखाने से मना इसलिए नहीं किया क्योंकि ऐसा करना अपनी ही सरकार के पिछले फैसले की विफलता को स्वीकार करना होता।
मुख्य बिंदु जो अनुत्तरित हैं :
अगर जयपुर-आगरा रूट पर यात्री नहीं मिले, तो क्या अहमदाबाद रूट के लिए सही सर्वे हुआ है?
क्या बार-बार एक ही ट्रेन का उद्घाटन करना ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की पराकाष्ठा नहीं है?
यह घटनाक्रम भविष्य के लिए एक नजीर है कि विकास केवल ‘हरी झंडी’ दिखाने से नहीं, बल्कि सही योजना और उसके सफल क्रियान्वयन से तय होता है।
About Author
You may also like
-
उदयपुर : विक्रमोत्सव’ के साथ 20 मार्च को मनेगा भारतीय नववर्ष, डॉ. प्रदीप कुमावत ने फूंका तैयारियों का शंखनाद
-
विद्या भवन शिक्षक महाविद्यालय में 6 दिवसीय SUPW शिविर : समाज सेवा और रचनात्मकता का दिखा संगम
-
अलविदा डॉ. मधुसूदन शर्मा साहब : खामोश इबादत जैसा व्यक्तित्व
-
जमीअतुल कुरैश की राष्ट्रीय कांफ्रेंस में जुटे देशभर के स्कॉलर्स : विभिन्न क्षेत्रों की ख्याति प्राप्त प्रतिभाओं को किया सम्मानित
-
उदयपुर में महाशिवरात्रि की धूम : फतह सागर तट और सेक्टर-3 के शिव मंदिरों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब