स्मृतिशेष : डॉ. भरत छापरवाल – चिकित्सा और शुचिता का संगम

उदयपुर। आज जब चिकित्सा क्षेत्र बाज़ारीकरण के दौर से गुजर रहा है, उदयपुर निवासी डॉ. भरत छापरवाल का जाना उस अंतिम कड़ी के टूटने जैसा है जो ‘डॉक्टर’ को ‘देवदूत’ मानती थी। डॉ. छापरवाल केवल एक सिद्धहस्त बाल रोग विशेषज्ञ (Paediatrician) ही नहीं थे, बल्कि वे उस विचार के संवाहक थे जिसमें अस्पताल एक मंदिर और मरीज़ ‘नारायण’ होता था। उनका निधन रतलाम में हुआ। आठ भाइयों में वे दूसरे नंबर के थे। उनके निधन की खबर सुनकर उदयपुर में सुभाषनगर स्थित उनके भाई डॉ. जेके छापरवाल के निवास पर पूर्व मंत्री डॉ. सीपी जोशी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत बीजेपी नेता अलका मुंदड़ा, पूर्व जिलाध्यक्ष रवींद्र श्रीमाली, दिनेश भट्ट, बीजेपी नेता अनिल सिंघल समेत कई जनप्रतिनिधि शोक जताने पहुंचे।

सिद्धांतों के लिए सत्ता को भी झुकाया

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल ‘अग्निपरीक्षा’ जैसा था। एक दौर था जब प्रवेश परीक्षाओं में धांधली और रसूखदारों के दबाव के बीच वे हिमालय की तरह अडिग खड़े रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री तक की सिफारिश को यह कहकर ठुकरा दिया कि “मेधा (Merit) से समझौता करना आने वाली पीढ़ियों के साथ गद्दारी होगी।” उनकी इसी निर्भीकता ने उन्हें देश के सबसे सम्मानित शिक्षाविदों की पंक्ति में खड़ा किया।

छापरवाल बंधु : सेवा की दो प्रतिमूर्तियां

डॉ. भरत छापरवाल की चर्चा उनके छोटे भाई डॉ. जे.के. छापरवाल के बिना अधूरी है। दोनों भाइयों की लोकप्रियता किसी परिचय की मोहताज नहीं है। जहां डॉ. भरत ने शिक्षा और प्रशासन के शिखर को छुआ, वहीं डॉ. जे.के. छापरवाल ने भी अपनी सेवाभावी छवि और चिकित्सकीय कौशल से जनता के दिलों में उतनी ही गहरी जगह बनाई। दोनों भाइयों ने मिलकर ‘छापरवाल’ नाम को चिकित्सा के क्षेत्र में ‘भरोसे’ का दूसरा नाम बना दिया।

सादगी ऐसी कि बंगला तक त्याग दिया

डॉ. छापरवाल की सादगी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। कुलपति रहते हुए उन्होंने सरकारी बंगला नहीं लिया ताकि आम जनता और छात्रों के बीच उनकी पहुंच बनी रहे। वे सत्ता के करीब रहे, पूर्व प्रधानमंत्रियों से उनके सीधे संवाद थे, लेकिन उनकी देह पर हमेशा विनम्रता की चादर रही।

गुरु का वो एक सवाल…

उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट वह क्षण था जब वे अमेरिका जाने वाले थे, हवाई जहाज़ का टिकट जेब में था। लेकिन उनके गुरु ने पूछ लिया— “भारत को तुम्हारी जरूरत है या अमेरिका को?” उस एक सवाल ने उन्हें हमेशा के लिए अपनी माटी से जोड़ दिया।

डॉ. भरत छापरवाल का भौतिक शरीर अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी छोड़ी हुई विरासत—ईमानदारी, सादगी और सेवा—आने वाली पीढ़ियों के डॉक्टरों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगी। वे वास्तव में उन लोगों में से थे जिनके लिए ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन का सत्य था।

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