
जावर (उदयपुर)। राजस्थान की माटी में जब ढोल की थाप और ‘सखियों’ के जयकारे एक साथ गूंजे, तो जावर का स्टेडियम सिर्फ एक खेल का मैदान नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण का एक जीता-जागता मंदिर बन गया। हिंदुस्तान जिंक, मंजरी फाउंडेशन और सखी शक्ति समिति के साझा प्रयासों से आयोजित ‘सखी उत्सव’ ने उस बदलाव की तस्वीर पेश की, जिसकी कल्पना शायद कुछ साल पहले किसी ने नहीं की थी।
जब उम्मीदें बनी ताकत : सांसद मन्नालाल रावत का संबोधन
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत ने जब मंच संभाला, तो उनकी बातों में इन महिलाओं के प्रति गहरा सम्मान दिखा। उन्होंने कहा, “सखी सिर्फ एक परियोजना का नाम नहीं है, यह उस भरोसे का नाम है जिसने ग्रामीण महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर देश की अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में खड़ा कर दिया है।” सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदुस्तान जिंक केवल माइनिंग नहीं कर रहा, बल्कि समाज की आधी आबादी में आत्मविश्वास का खनन कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि जब नारी आत्मनिर्भर होती है, तो समाज और राष्ट्र की नींव अपने आप फौलादी हो जाती है।
संघर्ष से सफलता तक : आईजी गौरव श्रीवास्तव के शब्द
पुलिस महानिरीक्षक गौरव श्रीवास्तव ने इस बदलाव को सामाजिक क्रांति करार दिया। उन्होंने बहुत ही मार्मिक अंदाज में कहा कि एक सशक्त महिला पूरे परिवार की रीढ़ होती है। आज जावर की ये महिलाएं घर चलाने, बच्चों को पढ़ाने और आय अर्जित करने में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सही अवसर और मंच मिले, तो ग्रामीण महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं।
मैदान में जोश और दिलों में जज्बा
सुबह की पहली किरण के साथ ही जावर स्टेडियम रंग-बिरंगी ओढ़नियों और सखियों की खिलखिलाहट से सराबोर हो गया।
खेलों में शक्ति प्रदर्शन : रस्साकसी में जोर लगाती सखियों के चेहरों पर जीत का जुनून था, तो कबड्डी और बोरा रेस में उनकी चपलता देख दर्शक दंग रह गए।
संस्कृति की महक : राजस्थानी लोकगीतों और भजनों पर जब ये महिलाएं थिरकीं, तो ऐसा लगा मानो पूरा जावर उत्सव मना रहा हो।
प्रदर्शनी से पहचान : स्टॉल्स पर सखियों द्वारा बनाए गए ‘दाइची’ के शुद्ध उत्पाद और ‘उपाया’ ब्रांड के वस्त्र उनकी उद्यमशीलता की कहानी खुद बयां कर रहे थे।
प्रतिबद्धता का संकल्प : आईबीयू हेड अंशुल खंडेलवाल
जावर माइंस के आईबीयू हेड अंशुल खंडेलवाल ने विश्वास दिलाया कि हिंदुस्तान जिंक इन महिलाओं के हर सपने को पंख देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि किस तरह शिक्षा संबल, समाधान और जिंक कौशल जैसे कार्यक्रमों के जरिए 184 से अधिक गाँवों की करीब 25,000 महिलाओं के जीवन में रोशनी आई है। उन्होंने गर्व से कहा कि आज माइनिंग प्रबंधन के उच्च पदों से लेकर धरातल तक महिलाएं अपनी मेधा का लोहा मनवा रही हैं।
एक मौन क्रांति का गवाह बना जावर
इस उत्सव में 3,000 से अधिक महिलाओं का एक साथ आना इस बात का प्रतीक था कि अब वे चुप रहने वाली या पीछे हटने वाली नहीं हैं। जावर माइंस के आस-पास के 400 समूहों ने यह साबित कर दिया कि ‘सखी’ परियोजना ने उनके जीवन से आर्थिक तंगी के अंधेरे को दूर कर दिया है। खेल, पुरस्कार, संगीत और आपसी संवाद के बीच इस उत्सव ने हर महिला के मन में एक नया संकल्प बो दिया—स्वयं से समाज, और समाज से राष्ट्र की मजबूती का संकल्प।
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