
उदयपुर। सिनेमा के सुनहरे पर्दे पर हमने कई बार ‘फाइल्स’ वाली कहानियां देखी हैं—चाहे वह कश्मीर की त्रासदी हो या ताशकंद का रहस्य। हाल ही में कन्हैयालाल हत्याकांड को समेटकर बनी फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ बॉक्स ऑफिस पर आई, मगर वह दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरी और बुरी तरह पिट गई। लेकिन इन दिनों झीलों की नगरी में एक ‘नई उदयपुर फाइल्स’ की खूब चर्चा है, जिसकी पटकथा किसी थ्रिलर फिल्म से भी अधिक पेचीदा और डरावनी है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कोई कैमरा ‘रोल-साउंड-एक्शन’ नहीं बोल रहा, बल्कि स्पाई कैमरे (गुप्त कैमरे) खामोशी से अपना काम कर रहे थे।
सत्ता की भूलभुलैया और ‘अदृश्य’ किरदार
इस कहानी का मुख्य विलेन एक वकील बताया जा रहा है, लेकिन राजनीति की दुनिया में असली खिलाड़ी वह नहीं होता जो सामने दिख रहा है, बल्कि वह होता है जिसकी उंगलियों के इशारे पर कठपुतलियां नाचती हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक मेवाड़ के इस ‘वीडियो कांड’ में दबी जुबान से सबसे ज्यादा चर्चा शहर और ग्रामीण जिले में उन पदाधिकारियों की है, जो शायद इस फिल्म के नेपथ्य (Background) में खड़े होकर डोरियां हिला रहे थे।
अजीब इत्तेफाक है कि जब पुलिस रात के तीन बजे दबिश देती है, तो खाकी के साथ एक खास राजनीतिक गुट के व्यक्ति मौजूद होते हैं। क्या यह महज़ इत्तेफाक था या किसी बड़े क्लाइमेक्स की रिहर्सल? जांच अधिकारी के बदले जाने और पुलिस की अति-सक्रियता ने पार्टी के भीतर ही एक नई ‘फिल्म’ शुरू कर दी है।
एआई (AI) का ‘स्पेशल इफेक्ट’ या असली कड़वाहट?
आजकल तकनीक का दौर है। पुलिस कह रही है कि वीडियो ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ का करिश्मा हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ये ज़ख्म असली हैं और वीडियो भी। दिल्ली के किसी बड़े ‘प्रोड्यूसर’ का फोन सीधे उदयपुर के ‘डायरेक्टर’ (पुलिस अधिकारी) को आता है और जयपुर के आला हुक्मरानों को कानो-कान खबर नहीं होती। यह दिल्ली बनाम जयपुर की वह ‘जंग’ है, जिसने इस पूरे प्रकरण को एक नया मोड़ दे दिया है।
गाज गिरी तो ‘कास्टिंग’ में होगा बड़ा बदलाव
राजनीति के इस सिनेमा में अब ‘री-टेक’ की गुंजाइश खत्म होती दिख रही है। सूत्रों की मानें तो हाई लेवल रिपोर्ट सीएम तक पहुंच चुकी है और जल्द ही एक्शन के संकेत मिल रहे हैं। यह भी बात पुरजोर तरीके से सामने आई है कि अगर गाज गिरी, तो सबसे पहला नंबर जिला पदाधिकारियों का होगा जिन्हें पद से हटाया जा सकता है। माना जा रहा है कि संगठन की छवि बचाने के लिए ‘कास्टिंग’ में यह बड़ा बदलाव अनिवार्य हो गया है।
अंतिम दृश्य की प्रतीक्षा
रविवार को जब शहर के एक कद्दावर नेता जयपुर से उदयपुर लौटेंगे, तो माना जा रहा है कि इस ‘फिल्म’ का इंटरवल खत्म होगा। फिलहाल तो स्थिति यह है कि जयपुर से दिल्ली तक के नेता एक-दूसरे से यही पूछ रहे हैं— “उदयपुर फाइल्स चर्चा में है… किसी ने देखी हो तो बताना।”
लेकिन याद रहे, राजनीति के इस ‘सिनेमा’ में जो सबसे ज़्यादा खामोश दिखता है, अक्सर वही ‘मास्टरमाइंड’ निकलता है। ‘उदयपुर फाइल्स’ का क्लाइमेक्स अभी बाकी है, और यकीनन यह किसी के लिए ‘ऑस्कर’ तो नहीं, लेकिन ‘पॉलिटिकल करियर’ के लिए ‘एग्जिट पोल’ जरूर साबित हो सकता है।
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